रोज जहाँ से बढ़ता है दिल, वही लौट आना फितरत है इसकी,
मत घबरा ए दिल इतना, यूँ ही बेसबब जिए जाना आदत है इसकी...

*
गूंगा सा फिरता था गम ये मेरा, एक तेरे दर पर आस मिली,
लाख दयारे ढूंढी इसने, एक तुझसे लफ्जों की खैरात मिली..

*
तेरे इश्क में सोचा था खुदा बन गया हूँ मैं,
तुझसे बिछड़ा तो फकत इंसा भी ना रहा..

*
कब तलक करता सबर आखिर,
दिल ही तो था, फिर तुम्ही पे आ गया.

*
उससे बिछड़ कर हम उससे याद करते रहे..
वो बैठा बिछड़ने के तरीके को कोसता रहा..

*
ए चाँद, तू तो था सदियों से हमसफ़र मेरा,
उस से बिछड़ कर सुना है तू भी बेनूर हो गया..

*
तुम ना कहती थी के बहुत बोलता हूँ मैं,
लो, एक तुम्हारे जाने से चुप हो गया हूँ मैं...

*
सब कुछ भुला देने के बाद भी जो कुछ याद रहेगा
....वो तुम ही तो हो

*
यादें 
हमेशा अनहोनी की तरह क्यूँ आती है..
बिना बताए.. चुपचाप.. दबे पाँव.. 
और पिछे छोड़ जाती है.. बस ..वीरानीयाँ

*
इस जीवन में एक तेरा इश्क ही अब तक की कुल जमा पूंजी है..
न कुछ खोने का डर है.. न ही लूट जाने का भय..

*
वो जो सिखाते थे अक्सर सलीके मुझको,
जुदाई के बाद सुना है मुझ जैसे हो गए है

*
इस कदर तो नहीं हुए थे तर्के मरासिम दरमियां तेरे मेरे,
की तुझ बिन कैसा हूँ मैं, इसका भी तुझे इल्म नहीं.

*
मैं खता दर खता करता रहा
वो मुस्‍कुरा कर माफ करते रहे
*
जाने क्‍यूं आज चांद बरबस तेरी याद दिला रहा है

तेरी तरह बेबस--
तेरी ही तरह लाचार
और हां


......
तेरी ही तरह मुझसे दूर
*
मुद्दते गुजरी पर वो हो ना सके हमारे,
कुछ कमी थी मेरी या थी उसकी मजबूरी...
*
अब नहीं करता मैं तुझे याद उस कदर
मगर ऐसा भी नहीं की भुला ही दिया
*
जो सीखा था तुमसे वो भी प्यार ही था..
जो भुलाया तुमने वो भी प्यार ही था..
जो दिया था तुमने वो भी प्यार ही था..
जो छिना तुमने वो भी प्यार ही था...

मेरे जीवन में प्यार का जरिया तुम थी..
या तुम्हारा होना ही प्यार था..
*
तुम उदास हो तो सुबहे उदास,
तुम तन्हा तो दिन तन्हा...
*
अपनी अनगढ़ लिखाई में कभी लिखा था जो तूने
आज तलक संभाले हुए हूँ वो अनमोल खत...

रोमांस की निशानी मान जिस नीले कागज को चुना था तूने
अब धीरे धीरे पीला पड़ता जा रहा है...
समय के साथ धुंधला पड़ जाने की गरज से लिया था तूने पेन्सिल का सहारा
ना जाने क्यूँ वक़्त के साथ तेरा लिखा गहराता ही जा रहा है.
*
जिन्हे कराया था वजूद-ए-अहसास कभी,
आज मुझसे मेरी औकात पूछते है.
*
जानता हूँ फकत कुछ पलों का ही था साथ हमारा..
ये पल इतने जल्दी गुजरेंगे... ये पता नहीं था...
*
और अब तुम नहीं हो तो
कुछ भी नहीं होता,
*
क्या पता क्या साज़िशे थी खुदा की... उसको छोड़ जिसके भी करीब हुआ... उसी से जुदा कर दिया
*
वो जो पीछे छूट जाएँगे बाद रुखसत के तेरे
उन्ही वादों के सहारे गुजरेगा ज़िंदगी कोई
*
आज भी इस कदर मुझ पर तारी है तेरे इश्क़ का असर,
लेना हो नाम जब भी खुदा का, आए है तेरा ही जिकर...
 *
वो जो गुज़री थी तमाम राते इंतज़ार मे तूने मेरे...
इस रात के आगोश मे उनका भी हिसाब हो जाने दे..
 *
कयामत के दिन होगा हिसाब मेरी ख़ताओ का
मैं हूँ बावफ़ा तब तलक ये भरम बना रहने दे...
 *
रुखसत हुए मुद्दते गुज़री... खुश्बू अब तक फ़िज़ाओं में है तेरी
कयामत तलक रहेगा इंतज़ार मुझको... जाने किस पल हो वापसी तेरी
*
वतन पर कर गये जो जान निसार अपनी...
क्या सोचते होंगे कर आए बेकार जवानी अपनी...
इन नामुरादों की खातिर ही क्या मरना था हमको..
क्यूँ बिलखता छोड़ चल दिए थे माँ को अपनी..
*
जब कभी वफ़ा का दम नही भरा तुमने...
तो कैसे बेवफा कहूँ तुमको...
*
हर लम्हा होती रही गफलतें उनसे हर कदम...
जब सुलझने का वक़्त आया तो ज़िंदगी की डोर चुक गयी...
 *
लम्हा लम्हा हम होने लगे थे करीब जिनके
अब हर पल उन्ही से दूर जाने की कोशिश होगी....
 *
 नीले कागज पे पेन्सिल से लिखा तेरा खत आज भी मुझे तेरी याद दिलाता है...
कागज पे लिखा तो धुंधला गया.. पर दिल पे लिखी इबारत मिटती ही नही...

 *
कह  तो  दिया  की  तुझसे  नहीं  अब  वास्ता  कोई,
पर  जानता  हूँ  के  बिन  तेरे  नहीं  मेरा  वजूद  कोई.
*

तर्क-ए-मरासिम, तर्क-ए-मुहब्बत, रुसवाइयां भी उनकी देख लिया,
अब देखे रुखसते ज़िंदगी का और बहाना क्या होगा..
*
कर भी लेते तेरी बातों पे एतबार मगर
अपने ही तजुरबों ने भरोसा करना भुला दिया.
*
लाख कोशिशो के बाद भी खुद को ना बदल पाया हूँ मैं..
जाने तुमको क्या हुआ जो तुम तुम नही रहे..
*
लोग क्या सोचेंगे मेरे बारे में इसका मुझे मलाल नही
रंज बस इतना रहा की तू भी औरो जैसा निकाला
*
तुमको समझा था इस ज़माने से जुदा मैने
रंज बस इतना रहा की तू भी औरो जैसा निकाला
*
उनकी मोहब्बत का असर इस कदर तारी है मुझ पर
तर्क-ए-मरासिम के बाद भी ना निकले है बद्दुआ कोई.
*
निभा नही पाया शायद मैं ही उनसे कभी, वो जो पल मे मिज़ाज़ बदलते है
लिबास की बात छोड़ दो यारो, वो रोज़ाना चेहरे बदलते है..
*

हम भी थे डूबे हुए जिंदगी के कारोबार में,
क्यूँ ये इश्क़ हुआ की हम भी निक्कमे हो गये.
*
ना लगे दाग बेवफ़ाई का खुद पे कभी..
शायद इसीलिए उसने कभी इज़हार-ए-मुहब्बत नही किया.
*
जब किया तब टूट कर प्यार भी उसी ने किया,
अब तर्क-ए-मरसिम के बाद ज़ीना मुहाल भी उसी ने किया.
*
ज़िंदगी का हर रंग सिखाया उसी ने..
ओर बेरंग भी उसी ने किया.
*
मेरे नाम के अधूरेपन को भरा उसके साथ ने..
ओर ज़िंदगी को अधूरा भी बनाया उसी ने.
*
खुशिया, अरमान, सपने यहा तक अपनी ज़िंदगी से भी कर लिया समझोता उसने..
ए खुदा ! एक माँ होने की और कितनी सज़ा मिलेगी उसे..
*
लग के उसके गले, खोजता था मैं जीने के बहाने अपने.
करके इनकार यूँ संगदिल ने, जीने की वजह ही छीन ली.
*
बदलते रिश्तो की तरह बदल गया है जो...
क्या तेरे बदलने भर से बदल जाएगा वो....???
*
गर बदल भी लिया तूने खुद को उस की खातिर...
ज़रा सोच क्या यही है वो... जिसे चाहा था तूने...
*
करम तेरा रहम तेरा, ये ज़िंदगी है क्या बस भरम तेरा
ना हो संग तेरा तो फिर बचा ना कुछ धरम मेरा....
*
कभी ना की परवाह तूने, ज़माने के रस्म-ओ-रिवाज़ो की
फिर क्यूँ खुद को बदलने पर आमादा है आजकल... ??
*
तेरे होने से ही तो है मेरा भी वजूद...
जब तुम ही नही तो काहे का मैं...
*
बचे हैं जो मरासिम दरमियाँ अपने..
ढह ना जाए तेरी खामोश नज़रों से...
*
क्यूं साथ मिला किसी और को, इन्तजार मुझको नसीब
वफायें मिली किसी और को, रूसवाईयां मुझको नसीब
*
लोग अपना बनाते ही क्यूँ है, जब बेगाना कर देना होता है.
ज़िंदगी उनसे मिलावती ही क्यूँ है, जब बिछड़ जाना होता है.
*
मेरी ये ज़िंदगानी अधूरी सी है तुम्हारे बिना,
इसे पूरा कर दो... बस ये एहसान कर दो..
*
यूँ तमाम कोशिशो के बाद हम दो से एक हुए थे..
अब मुद्दते गुज़रेगी फिर से दो हो जाने मे...
*
तेरे साथ खुदा के दर पे जाने से डरता है दिल
एक खुदा के सामने दूसरे से माँगा जाए कैसे
*
तुझसे बिछड़ के बस यही सोचता हूँ...
तेरे साथ ये ज़िंदगी बिगाड़ दूं..
या तेरी यादों में ज़िंदगी गुज़ार दूं




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कैसा लगा.. 
(हालाँकि मैं नेरूदा नही.. और मैने उन्हे ज़्यादा पढ़ा भी नही.. पर ये कविता मेरे किसी अपने को बहुत पसंद है.. ओर उसी ने सबसे पहले मेरा परिचय नेरूदा से करवाया.. पता नही क्यूँ आज जब इस कविता को पढ़ने बैठा तो लगा की इसका एक एक शब्द मेरे मनोभाव को व्यक्त कर रहा है... अत: ये अनुवाद उस खास इंसान को समर्पित)

शायद आज रात मैं लिख पाऊंगा अपनी सबसे उदास कविता

इतनी कि जैसे ये रात है सितारों भरी
और नीले तारे सिहरते हैं दूर कहीं बहुत दूर
रात की हवाएं इस अनंत आकाश मे गाते हुए यूँ ही बेसबब डोलती हैं

आज रात लिख पाऊंगा अपनी सबसे उदास कविता
क्योंकि मैंने उसे चाहा, ओर थोड़ा उसने मुझे
इस रात की तरह थामे रहा उसे बाहों में
इस अनंत आकाश तले चूमा था उसे
क्योंकि उसने मुझे चाहा, थोड़ा  मैंने उसे
उसकी बड़ी ठहरी आँखों से भला कौन न करेगा प्यार
आज रात  लिख पाऊंगा सबसे उदास कविता अपनी
ये सोच कर कि अब वह मेरी नहीं. इस अहसास से कि मैंने उसे खो दिया

रातों को सुनकर, और-और उसके बिना पसरती रात
चारागाह पर गिरती ओस के मानिंद उसके छंद गिरते है आत्मा में
क्या फर्क पड़ता है यदि मेरा प्रेम उसे संजो न सका
रात तारों भरी है और वह मेरे संग नहीं
बस ये सब है. दूर कोई गाता है बहुत दूर

उसे खोकर मेरी आत्मा व्याकुल है
निगाहें मेरी खोजती हैं उसे, जैसे खींच उसे लायेंगी करीब

दिल मेरा तलाशता है, पर वह मेरे साथ नहीं.

वही रात, वही पेड़, उजला करती थी जिन्हें
पर हम, समय से .. कहाँ रहे वैसे

ये तय है अब और नहीं करूँगा उससे प्यार, पर मैंने उससे कितना किया प्यार
मेरी आवाज़ आतुर ढूंढ़ती है हवाएं जो छू सकें उसकी आवाज़
होगी, होगी  किसी और की जैसे वह मेरे चूमने के पहले थी


उसकी आवाज़,  दूधिया देह और आँखें निस्सीम
ये तय है अब और नहीं करूँगा उससे प्यार, या शायद करता रहूँ प्यार


कितना संक्षिप्त है ये हमारा प्यार.. और भूलने का अरसा कितना लंबा
ऐसी ही रात में मैं थामे था उसे अपनी बाहों में


मेरा मान शांत नही है उसे खोकर
शायद यह अंतिम पीड़ा है जो उसने दी है मुझे

और ये अंतिम कविता जो मैं लिखूंगा
उसके लिए .सिर्फ़ उसी के लिए


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कैसा लगा.. 
हिंदी कविता संसार की दुनिया में शायद दुष्यंत कुमार के बाद सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले  कवी अदम गोंडवी जी की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना. भले सरकारे कितने दावे कर ले... भले लोग समानता की कितनी ही बाते कर ले... जब जब गोंडवी जी की ये रचना पढ़ता हूँ... लगता है आज भी यही हकीकत है हमारे गाँवो की... आज भी यही मानसिकता है हमारे समाज की... पेश है  राम नाथ सिंह ' अदम गोंडवी ' की ये रचना .....

आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी कि कुएँ में डूब कर

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा

कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई

कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है

थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को

डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से

आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में

होनी से बेखबर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी

चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई

दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया

और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज़ में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में

जुड़ गई थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था

बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है

कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएँगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं

कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें

बोला कृष्ना से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से

पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में

दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर

क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया

कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो

देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारो के यहाँ
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ

जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है

भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाँहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ

आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई

वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही

जानते हैं आप मंगल एक ही मक़्क़ार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है

कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज़्ज़त रहे्गी आपकी

बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया था

क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था

रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था

सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में

घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
"जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने"

निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर

गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर "माल वो चोरी का तूने क्या किया"

"कैसी चोरी, माल कैसा" उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस होश फिर जाता रहा

होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -

"मेरा मुँह क्या देखते हो ! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो"

और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी

दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था

घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे

"कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं"

यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से

फिर दहाड़े, "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा

इक सिपाही ने कहा, "साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"

बोला थानेदार, "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो

ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है, जेल है"

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
"कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल"

उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को

धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को

मैं निमंत्रण दे रहा हूँ- आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में

गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही

हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए !
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कैसा लगा.. 
मेरी जबां पर था उसको भरोसा इतना,
मुझसे खुदको भुला देने की दुहाई ले ली,

कैसे बयां हो सितमगर के सितम,
छीन के हंसी इन लबों की हंसने की दुहाई ले ली.

यूँ रो के गुज़र दी शब हमने आँखों ही आँखों में,
के बेदर्द कहीं रोने की भी न मनाही कर दे.

यूँ बयां हुई गम-ए-दौरान की हकीकत,
संग तो रहा सनम, मगर संगे दिल बनकर 







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कैसा लगा.. 
तुम कहती हो की तुम्हे मुझसे प्यार नहीं है..
ठीक ही होगा....

क्या हुआ जो मेरा दुःख तुम्हारी पलकें भिगो देता है,
क्या हुआ जो मेरी नाराजगी तुम्हे सताती है,

क्यूँ फरक पड़ता है तुमको रूठ जाने से मेरे ,
क्यूँ मेरी चिंता में पड़ते है पेशानी पर बल तेरे,

यूँ ही करती होंगी तुम फ़िक्र मेरी शामो-सहर,
यूँ ही बांटे होंगे मुझसे रंजो-गम अपने,

क्यूंकि हमेशा सच ही तो कहती हो तुम,
ये भी सच ही होगा की.... तुमको मुझसे प्यार नहीं.


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कैसा लगा.. 
(दुष्यंत जी की लिखी ये कविता मेरे साथ मेरे अज़ीज़तम कुछ ओर लोगो को बहुत पसंद है. इसलिए जब उनसे दिल की बात कहने का मोका आया तो इसका सहारा लेने से खुद को रोक नही पाया. कविता का मूल भाव दुष्यंत जी का ही है.... मैने बस अपने मन की बात कहने के लिए उनके शब्दों मे कुछ हेर फेर किया है... जिसके लिए मैं दुष्यंत जी से क्षमाप्रार्थी हूँ.)

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ
मेरा वो प्यार आपको बताता हूँ

एक समंदर सा है उसकी आँखों में
मैं जहाँ डूब जाना जाता हूँ

वो किसी रेल-सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ

हर तरफ़ ऐतराज़ होता है
मैं अगर उसके पास जाता हूँ

वो मुझसे रूठ गई है जबसे
और ज़्यादा उसके करीब पाता हूँ

मैं उसे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ

कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ








(अपने इस दुस्साहस के लिए दुष्यंत जी सहित उनके लाखो प्रशंसको से क्षमाप्रार्थी हूँ )
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कैसा लगा.. 
आखिर हम लोग क्यूँ निराशा को बुरा मानते है. ये नैराश्य भी तो जीवन का अहम् अंग है. अगर इन्सान की जिंदगी में महज खुशियाँ ही तो शायद उसको इनके मायने भी मालूम न हो... पर अगर किसी इन्सान को लाख गम उठाने के बाद ख़ुशी की एक छोटी सी भी खबर सुने दे तो वो उसे सहरा में पानी की बूँद नजर आती है. ये निराशा और दुःख ही है जो हमें जीवन में पीछे मुड के देखना सिखाती है. हमें हमारी गलतियों का एहसास कराती है. जिन्दगी की भाग दौड़ में हम अक्सर अपने आप का विश्लेषण करना कहीं छोड़ देते है.. निराशा से भरा समय हमसे वो भी करवा देता है. लगभग यही वो समय होता है जब इन्सान अपने गुनाहों का प्रायश्चित करता है. यही वो समय है जब इन्सान अपनी खूबियों-खामियों को जानने की कोशिश करता है. यही वो समय होता है जब अपने पराये का भेद मालूम पड़ता है... यही वो समय है जब इन्सान अपने दुखो से लड़ना सीखता है... अपनी गलतियों से सबक लेकर फिर से उठ खड़ा होना सीखता है. इसलिए कहता हूँ की... नैराश्य भी हमारे जीवन का ही एक अहम अंग है. इससे दूर भागने की बजाय इसका सामना करना सीखे...






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कैसा लगा.. 
हां तो भाई लोग, देखो जैसा की हमारी हिन्दी फिल्मों में बडे भाई, दोस्त और हितैषी राय देते है, मै भी राय दे रहा हूं कि ईश्क मौहब्बत जैसी फिजूल कि चीज से दूर ही रहों। पर अगर फिर भी तुमने ठान ही लिया है तो आज मैने भी तुमको एक लम्बा चौडा लेक्चर मारने की ठान ली है। सही भी जब बन्दे ने गाडी का एक्सीडेन्ट करने का मन बना ही लिया है तो लगे हाथ मै अपना ज्ञान झलकाने में पीछे क्यूं रहूं ?
देखो भाई लोगो.... अच्छा एक मिनट इससे पहले कि ये एनजीओ वाले मुझ पर जेण्डर बायस पर बात करने का आरोप लगा दें। मै साफ कर दूं मै बार बार भाई लोग इसलिये कह रहा हूं कि ये छिछोरापन हम लडकों के हिस्से में ही आया है इसलिये समझाना भी तो उन्हे ही पडेगा। खुदा कि नेमत से ये हसीन चेहरे तो बेचारे हमेशा से ही मासूम होते आये है। अव्वल तो बन्दे की गाडी का एक्सीडेन्ट करवाने में इनका कोई योगदान होता ही नहीं है, गर हो भी तो बाद में बडी मासूमिसयत से ये कह भर दे कि देखो जी! मै घरवालों के खिलाफ नहीं जा सकती। बस हो गया बन्दा खल्लास। इसलिये आज का ज्ञान हर वीकेन्ड पर सच्चा प्यार कर बैठने वाले भाई लोगो के नाम..
हां तो भाईयों.. देखो अगर तुमने एक बार फिरसे अपनी रातों की नींदे, अपना सुकून तबाह करने का मन बना ही लिया है तो सुनो... देखो अपना प्यार जगाने के लिए सबसे पहले शाहरूख खान की कोई अच्छी सी फिल्मे देखो... वैसे अच्छी क्या वो तो वैसे भी अपनी हर फिल्म में दूसरे की गर्लफ्रेण्ड को लेकर भागने का आदि है। क्या है ना उससे तुमको भी हौसला मिलेगा कि किसी को भी पटाया जा सकता है। फिर अपने मोबाईल में अलग अलग जोनर के गाने, गजले लोड करवाओ, पता नहीं मिलने वाली लडकी का कैसा टेस्ट हो? फिर ना शहर कि सिटी बसों में बडे शरीफ और सज्जन बनकर घूमो.. थोडा होमवर्क करो। और मालूम करो कि तुम्हारा लक्ष्य क्या है.. अर्जुन बन जाओ बेटा। और जब कोई लडकी तुम्हारे साथ अपना कीमती टाईम बर्बाद करने को तैयार हो जाए तब तुम भी कमर कसके जंगे आजादी के मैदान में कूद पडो। फिर देखना मैडम जो तुमको टोकना शुरू करेगी... ऐसा नहीं करो वैसा करो... स्मोकिंग मत किया करो, बीयर से मोटापा बढता है, मन्दिर जाने से भगवानजी आशीर्वाद देते है, तुम्हारे दोस्त अच्छे नहीं है... और जब पांच-छः महिने में पठ्ठा मिनी मुरारी बापू बन जाए तो फिर किसी रोज क्रिस्टल पाल्म में आईनोक्स थियेटर में बैठ कर मूवी देखते देखते तुमको बोलेगी, जानू! अब तुम पहले जैसे नहीं रहे। तो भाई लोग, अपने आप को बदलने के लिए तैयार हो जाओ और कूद पडो.... पर एक बात कहूं, सब करना पर कभी किसी का दिल नहीं तोडना..


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कैसा लगा.. 
हे री मैं तो प्रेम दीवानी , मेरा दर्द न जाने कोय ,
सूली ऊपर सेज हमारी , किस विध सोवण होय |
गगन मंडल पे सेज पिया की , किस विध मिलना होय ||
घायल की गति घायल जाने , कि जिन लायी होय |
जौहरी की गत जौहरी जाने , कि जिन जौहर होय ||
दर्द की मारी बन बन डोलूं , बैद मिलिया नहीं कोय |

मीरा की प्रभु पीर मिटेगी , जब बैद सांवलिया होय ||
प्रेम में ऐसा मुकाम मिल पाना हर किसी के नसीब मे कहाँ... जहाँ "मैं" ख़तम हो जाए वहीं से सच्चे इश्क़ की शुरुआत होती है.. इसी समर्पण भाव के चलते "मीरा" को तो उसके "श्याम" मिल गये.. पर हम सब किसी ना किसी दुनियादारी के खेल मे इस कदर फँसे है की अपने कृष्ण को पाना तो दूर... उसे पहचान तक नही पाते है. दरअसल प्रेम का स्वरूप ही इतना उद्दात है की उसमे व्यक्ति का अहंकार, उसका Ego सब मिट जाते है. पर उसके लिए जरुरी है की प्रेम में समर्पण का भाव आये. क्यूंकि जब तक हमारे मन में अपने प्रियतम पर अधिकार की भावना रहेगी.. प्रेम में इर्ष्या और जलन का भी स्थान रहेगा.. और ये इर्ष्या और जलन ही एक दिन शक और संदेह को जन्म दे देते है. और जब ये भाव किसी रिश्ते में आ जाये तो उसका ख़तम हो जाना भी सुनिश्चित सा हो जाता है. इसलिए प्रेम में कभी अधिकार का भाव न आये. दूसरा हम सभी इन्सान है ऐसे में हममे इंसानी गुण-दोषों का होना भी लाज़मी है.. इसलिए हमें कभी ये आशा नहीं करनी चाहिए की हमारे प्रिय में सिर्फ खूबियाँ ही हो खामियां न हो.. साथ ही उसका फिजूल विश्लेषण भी न करें.. बस समर्पित कर दें अपने आप को अपने प्रिय के लिए, अपने प्रेम के लिए.. बिना किसी सोच विचार के... फिर देखिये ...
(मीरा बाई का स्केच www. barunpatro.blogpost से साभार)


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कैसा लगा.. 
(एक बार फिर से मुझे अपनी भावनाओं, अपने प्रेम को अभिव्यक्त करने के लिए आलोक जी के शब्दों का सहारा लेना पड़ा. दरअसल जब मैंने उनके काव्य संग्रह "वेरा! उन सपनो की कथा कहो" में लिखी उनकी इस रचना को पढ़ा तो मुझे लगा की ये सब वही है जो मैं न जाने कब से चाहता था. वही शब्द... वही भाव... बिना आलोक जी की अनुमति के उन्हें यहाँ पेश कर रहा हूँ... हालाँकि लगभग पूरी कविता ज्यों की त्यों वही है जैसी आलोक जी ने लिखी थी... बस अपने अनुसार कुछ शब्दों का मामूली सा हेर फेर किया है... बहरहाल पूरी की पूरी कविता आलोक जी की लेखनी को समर्पित.)





मैं तुम्हें प्रेम करना चाहता था
जिस तरह से तुम्हें किसी ने नहीं चाहा
तुम्हारे भाई, पिता, मां और यहाँ तक की तुम्हारा जीवनसाथी भी..
जिस तरह से तुम्हें नहीं चाह सके
मैंने चाहा था तुम्हें उस तरह से चाहना
चांद सितारों की तिरछी पड़ती रोशनी में
दपदपता हुआ तुम्हारा चेहरा
बहुत करीब से देखना....

तुम्हें छूने की इच्छा थी
तुम्हारे शरीर के हर हिस्से को
खुद में जज़्ब कर लेने की गहरी कामना भी
पर इन सब से ऊपर थी
तुम्हारे होठों की हंसी को
सदा फूलों में डूबा देखने की ख्वाहिश
सबसे परे था
बहे जा रहे समय के इस दरिया में
इत्तफाकन मिले तुम्हारे साथ को
बड़ी लौ से बचाये रखने का यत्न
देर तक तुम्हारे हांथों को
बहुत कोमलता से
अपने हांथों में सहेज रखने की भोली इच्छा

मैं चाहता था
तुम्हारा बचपन तुम्हारे कैशोर्य को खुद जीना तुम्हारे साथ
तुम्हारे अतीत की गलियों, मोहल्लों, शहरों मे जाना
जिस नदी के जिस किनारे कभी तुम ठहरी हो कुछ पल को
अपनी हथेलियों में वहां उस नदी को उठा लेना
जो फूल तुम्हें सबसे प्रिय रहे कभी
उनकी एक-एक पंखुरी को हाथ में ले कर देर तक सहलाना
जो गीत कभी तुमने गाये थे
उनके सारे बोल
सदा को इस पृथ्वी पर गुंजा देना

बहुत भोली थीं मेरी इच्छायें
उन इच्छाओं में तुम सिर्फ नारी नहीं रहीं
न कोई सिर्फ बहुत प्रिय व्यक्ति
सिर्फ साथी नहीं
फिर भला सिर्फ प्रिया
सिर्फ कामिनी ही कैसे होतीं !

तुमको इस तरह धारण किया खुद में
जैसे दरख़्त शरद की हवाओं, वन के रहस्यों और
ऋतु के फूलों को करते हैं
तुम स्वप्न नहीं थीं मेरे लिये
न सुंदर वस्तुओं की उपमा
मैंने सोचा था कि
तुममें मेरे जीवन का कोई बहुत गहरा अर्थ है

पर तुम्हारा जीवन क्या था मुझमें ?

यहीं से वह प्रश्न शुरु हुआ
जिसके फंदों में हर शब्द उलझ गया है...

मेरी भोली इच्छाओं पर
तुम्हें चाहने
और खु़द को चाह पाने का योग्य बनाने की कोशिशों पर
दुख की तेज चोटें पड़ रही हैं ....

तुम कभी जानोगी क्या कि अपने दिल की आंच में
तुम्हारे लिये बहुत करीब से मैंने क्या महसूस किया था...?

तुम यक़ीन करोगी तुम्हारे लिये
कितनी अनमोल सौगातें थीं मेरे पास....
विंध्य के पर्वत थे
सतपुड़ा के जंगल
गंगा की वर्तुल लहरें
नक्की का शीतल जल..
पलाश के इतने फूल जितनी पृथ्वी पर नदियां
तारों भरी विंध्य की रात, कास के फूल
कनेर की पत्तियां
पहाड़ी गांवों की शामें
और कुछ बहुत अकेले खंडहर
कुछ बहुत निर्जन पुल
सौंदर्य के कुछ ऐसे सघन बिंब
जिन तक काल की कोई पहुंच नहीं
और दिल के बहुत भीतर से उठी एक सच्ची तड़प...

सुनो, यह सब तुम्हारे लिये था
और यह सब आज बिलख उठा है
- ये जंगल, पर्वत, लहरें
ये फूल, नदी, शाम और खंडहर

तुम होतीं तो इन्हें एक अर्थ मिलता
इनका एकांत यों भी होता
जैसे आकाशगंगाओं में तारों की हंसी गूंजे
इन्हें सिर्फ प्यार नहीं एक संबंध चाहिये था
एक संबोधन चाहिये था ...
एक स्पर्श और एक हंसी चाहिये थी
अफसोस ! ऐसा कुछ न हुआ
और इन सब में गहरे उतर गये हैं
दुख के मौसम और उदासी के बोल ....

तुम्हारे इसी नगर में मैं
इस सब के साथ थके कदमों से गुजरता हूँ
कभी तुम्हारे घर के सामने से भी
कभी बहुत दूर उन रास्तों से
उन लोगों से, उन इमारतों और उन दरख़्तों से
जो तुमसे आश्ना थे
पर यह दर्द है कि बढ़ता ही जाता है
गो कि कभी कभी लगता है कोई रंजो-ग़म नहीं
फ़क़त उदासियां हैं शाम की ....
और मैं....
मैं आज भी तुम्हे प्रेम करना चाहता हूँ...
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पिछले दिनों चर्चित पाकिस्तानी फिल्म "बोल" देखी. हालाँकि जिन लोगो ने इन्ही निर्देशक महोदय की "खुदा के लिए" देखी होगी उन्हें ये फिल्म थोड़ी कमतर लगी होगी, मगर फिर भी अपने तमाम झोलों के बावजूद पाकिस्तान के माहौल को देखते हुए इतनी यथार्थ परक फिल्म बनाने के लिए निर्माता-निर्देशक को कोटिश: साधुवाद. 
दरअसल फिल्म की शुरुआत की बड़ी दमदार है. चंद घंटो बाद फांसी के फंदे पर झूलने वाली लड़की का मीडिया के सामने अपनी कहानी बयां करना, पलकों के कोरों को भीगने के लिए काफी था. उसके बाद जैसे जैसे फिल्म बढती गयी एक के बाद एक नायिका के जख्म उघड़ने लगे. मुस्लिम परिदृश्य में लिखी इस कहानी में लगभग हर दूसरी महिला की कहानी नजर आती है, भले देश कोई हो हमारे यहाँ औरतों की कमोबेश यही स्थिति नज़र आती है. उन्हें या तो महज बच्चे पैदा करने की मशीन समझ लिया जाता है या हुकुम की तामिल करने वाली बांदी. फिल्म में कुछ पात्र बड़ी ही शिद्दत के साथ लिखे गए है.. मसलन हर बात को तार्किक रूप से सोचने और उस पर अडिग कड़ी नायिका हो या सब कुछ जानबूझ कर चुपचाप सहन करती उनकी लाचार मां... पिता से छुप कर आकाश में उड़ने के ख्वाब बुनती नायिका की बहन. या उन सब से अलग थलग अपने नपुंसक होने का दंश झेलता सैफू. और उन सब पर भारी बात बात पर अपनी खीज मिटने को घर की औरतो पे हाथ उठता नायिका का पिता. सभी किरदार कहानी को आगे बढ़ाने में अपना सहयोग करते है. फिल्म की कहानी तो मन को झकझोरने वाली है ही..   संवाद उससे भी जानदार.. मसलन ...
नायिका का ये कहना की "हर बरस हमारे घर दाई आने लगी". या "मर्द हो, इसलिए जब लाजवाब हो गए तो हाथ उठा दिया." इसी तरह जब सैफू मर्द होने के गुण बताता है तो कहता की  "मर्द बनने के करना ही क्या होता है.. थोडा माथे पर त्योरियां चढ़ा लो, आवाज को भारी बना लो, बदजबान बनो... और घर की औरतो को दो-चार हाथ जमा दो."
बहरहाल अपनी हर बेवकूफी के लिए खुदा/भगवान को जिम्मेवार ठहराने वालो... सहित आप और हम जैसे आम आदमियों को भी सोचने पर मजबूर करती है की... सिर्फ मारना ही जुर्म क्यूँ है.. पैदा करना क्यूँ नहीं?

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काफी अरसा हो गया इस वाकये को पर आज न जाने क्यूँ फिर से याद आ रहा है. मेरे घर से लगता हमारे पडोसी का घर है. उन्होंने एक चिड़िया पाल रखी  है. पाल क्या रखी है, बस वो दिनभर उन्ही के आंगन में फुदकती रहती है. मैं अक्सर उसको निहारता रहता. बड़ी प्यारी चिड़िया थी... एकदम सुनहरी सा रंग..  और पडोसी ने उसके पैरो में एक छोटा सा घुंघरू भी बांध रखा था, जिससे वो जब भी यहाँ से वहां घुमती तो घर में घुंघुरू की बड़ी ही प्यारी सी आवाज भी उसके साथ चलती.
मैं जब भी उसको देखता मेरा बहुत मन होता की काश वो चिड़िया एक बार ही सही मेरे घर के आंगन में भी उतरे, अरसे के इंतजार के बाद एक दिन वो सुनहरी चिड़िया पडोसी के छज्जे से उतर कर मेरे आंगन में आ पहुंची... उसे यूँ अचानक आया देख मुझे विश्वास नहीं हुआ की जिसे रोज दूर से देखता था आज वो मेरे इतना करीब है.. की मैं उसे छू सकता हूँ.. उसको महसूस कर सकता हूँ.. बहरहाल मैंने उसको अपने हाथो से चुग्गा खिलाया.. वो उचल कर मेरे हाथ पर बैठ गई और मैं उसे देर तक सहलाता रहा.. 
उसके बाद तो ये लगभग रोज़ का ही सिलसिला हो गया. उसका सवेरे सवेरे आना और देर तक हम दोनों का साथ बैठना.. मुझे लगाने लगा था की अब वो पडोसी के घर की चिड़िया नहीं बल्कि मेरे घर की ही सदस्य है. एक खास किस्म का लगाव भी हो गया था उससे. फिर अचानक से न जाने क्यूँ उसका हमारे घर आना बंद हो गया.. देखा फिर से वो वहीँ पडोसी के आंगन में फुदकती घूम रही है.. अपने पैरो से घुंघरुओं की आवाज करते हुए.. बहुत इंतजार किया उसका की वो फिर से मेरे आंगन में भी उतरे.. पर शायद ये होना फिर से मुमकिन नहीं था.. अब भी देखता हूँ उस चिड़िया को पडोसी के आंगन में फुदकते हुए.. तो दिल को सुकून सा मिलता है.. की चलो  मैं उसको यूँ ख़ुशी से फुदकते हुए तो देख सकूँगा. ... भले इस आंगन न सही.. उस आंगन ही सही. 


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मैं हमेशा से इस बात पर अडिग था की रिश्तों में कभी झूठ नहीं होना चाहिए. और था क्या आज भी अडिग ही हूँ. पर अपने पिछले कुछ अनुभवों से मैंने ये जाना की हमेशा सच को जानना इतना भी जरुरी नहीं होता है. दरअसल कई दफा सच का स्वरूप इतना उलझा और विकृत हो जाता है की लाख कोशिशों के बाद भी वो समझ नहीं आता. ऐसे में उसका सामने न आना ही श्रेयस्कर होता है. और फिर रिश्ते तो हमेशा से ही केवल और केवल विश्वास की बुनियाद पर टिके होते है.. ऐसे में उन्हें सच की बैसाखियों की शायद जरुरत नहीं होती. इसके अलावा एक बात और भी है यदि रिश्तों में कोई बात हमारे साथी द्वारा छिपी भी गयी है तो ये भी जरुर है की शायद उस सच के सामने आने पर रिश्ते को खो देने का डर उन्हें भी रहा होगा. ऐसे में फिजूल केवल इसलिए की हमें सच जानना ही है.. हम उस की जड़ तक जाने की कोशिश करे... मेरे ख्याल में ये बेमानी होगा. क्यूंकि सच को जानने की जो प्रक्रिया है वो बड़ी तकलीफदेह है. कई मर्तबा ये शरीर से मवाद रिसने जैसा हो जाता है. और फिर अगर इन सबसे गुजर कर सच हासिल भी कर लिया तो उसका क्या फायदा? क्यूँ इससे न केवल हम अपने साथी का विश्वास खो देते है... बल्कि उसपर से हमारा विश्वास भी चकनाचूर हो जाता है. और फिर ये सच सिर्फ रिश्तो को तोड़ने के लिए कुछ बेवकूफाना आधार देने के सिवा और किसी काम का नहीं रह जाता है. ऐसे में शायद अपनी प्राथमिकताये हमें खुद ही तय करनी चाहिए की हमारे लिए सच ज्यादा मायने रखता है या रिश्ते....
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सीखा भरोसा तुझी से, ओर निभाना इश्क़ भी सिखाया तुम्ही ने,
भले ना खाई हो कभी कसमे तूने, पर कसम निभाना भी सिखाया तुम्ही ने,

ना मिल सकोगी कभी ये एहसास भी कराया तुम्ही ने,
ओर जुदा ना रह सकोगी, ये जताया भी तुम्ही ने,

ना इकरार ही करे हो, ना इनकार की किया तुम्ही ने
हर बात कहना ज़रूरी तो नही, ओर कह भी दीया तुम्ही ने

सफाई देना ना कभी गवारा था तुम्हे
आज हर बात की सफाई भी दे दी तुम्ही ने

एक मेरे खोने के डर से, क्या क्या ना किया तुमने
एक मैं जो हर बार बस खता पे खता ही किए हूँ..
.
था मैं खुद से ही शर्मिंदा, था दामन भी मेरा दागदार
बस था तो तेरे इश्क़ का इल्म ओर रूह का तेरी साथ.



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आलोक जी की एक रचना है एक दिन आयेगा... जिसमें उन्होने जीवन में किसी के आगमन पर होने वाले संभावित बदलावों, उन खुषनुमा अहसासों का बडा ही खूबसूरती के साथ चित्रण किया है। आलोकजी की पुस्तक वेरा.... उन सपनों की कथा कहो ! में प्रकाषित ये काव्य पाठ हमेषा से ही मेरे दिल के करीब रहा है। हांलाकि उनके लिखे का मैं प्रत्युत्तर दूं... ऐसी धृष्टता करने के बारे में मैं कभी सोच भी नहीं सकता... ये मेरा एक विनम्र प्रयास है, आलोकजी की लेखनी को प्रणाम करने का....




और जब तुम चली गई...
एक दिन वो भी आया जब तुम चली गई
जिन रास्तों से तुम गुजरी थी
अब वहां छाया है घनघोर बियाबान

जिन झरनों की छुआ था तुमने
खारा हो चुका है उनका सारा पानी
जिन दरवाजों पर हुई थी कभी
तुम्हारे हाथों की थपथपाहट
छायी है वहां आज मरघट सी वीरानियां

जिस शख्स को अपना मान की थी तुमने पहरों पहर बाते
उसके सीने में सुलगता है नफरतों का ज्वालामुखी
जिस कांधे को छुआ था तुमने
वो अब नहीं उठा पाता है खुद अपना बोझ भी
जिन आंखें में झांका था तुमने कभी
उन आंखों में अब बस पतझड सा सूनापन है

जिस व्यक्ति को तुमने प्यार किया
चाहा था जिसकों दिल की तमाम गहराईयों से
आज नरक सा हो चला है उसका सारा जीवन

चैत्र गुजरा भी नहीं
और पत्रहीन हो गए इन पलाश-वृक्षों पर
जैसे रंग उतरता है
ऋतु भीगती है भोर की ओस में
वैसे ही गुजर गई तुम एक दिन हमारी इच्छाओं, दुखों और स्वप्नों के बीच से

और....... आज मैं दुखी नहीं हूं तुम्हे लेकर
ना तुम्हे दोष दूंगा, ना ही कोई उम्मीद पाली है
पर, सचमुच आज भी तुम्हे चाहता हूं
और शायद तुम भी महसूस कर पा रही हो
मेरे प्यार का ताप

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मेरी ये ज़िंदगानी अधूरी सी है तुम्हारे बिना,
इसे पूरा कर दो... बस ये एहसान कर दो..
तुम्हारे आने भर से ये दरो दीवार घर बन जाएँगे..
तुम्हारे आने से ये अधूरापन पूरा हो जाएगा
यहाँ तुम पर शक करके कोई तुम्हे छोटा नही बनाएगा,
...ना यहाँ तुमसे कोई सवाल होंगे, ना ही उनके जवाब माँगे जाएँगे,
फिर ये ज़िंदगी यूँ ही गुजर जाएगी तमाम मुश्किले बस आसां होगी..
ये सब मुमकिन होगा.... बस तुम एक बार हाँ कह दो...
मेरी ज़िंदगानी अधूरी ही है... इसे पूरा कर दो...



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यूँ तमाम कोशिशो के बाद हम दो से एक हुए थे..
अब मुद्दते गुज़रेगी फिर से दो हो जाने मे...
कमल हम साथ नहीं रह सकते... मैं अपने परिवार को नहीं छोड़ सकती... भले उसी की खातिर मगर मुझे फिर से उसी घर में जाना पड़ेगा जहाँ मेरा दम घुटता है.... जहाँ हर पल मुझ से मेरे होने का एहसास छिना जाता है... मैं कहीं भी किसी भी हालत में रह सकती हूँ... मगर मेरे परिवार की खातिर मुझे ये समझोता करना पड़ेगा... और मैं कम से कम तुमसे तो ये उम्मीद कर सकती हु की तुम तो मुझे समझोगे... और अगर हो सके तो मुझे भुला देना... नंदिनी के ये आखिरी शब्द आज पांच साल बाद भी मेरे कानो में गूंजते रहते है... सब कुछ जानते हुए भी मैं कदम दर कदम बस उसी का होता गया था। हालाँकि उसने मुझे हमेशा समझाया की मैं उसे ज्यादा सीरियस ना लू... क्यूँ उसकी लाइफ में सब कुछ अनसर्टेन है... कब क्या होगा खुद उसे भी नहीं मालूम...
दरअसल नंदिनी की शादी उसके घरवालो ने उम्र के उस दौर में ही कर दी थी जब शायद उसे इसका मतलब भी मालूम नहीं था... नंदिनी... मेरे साथ मेरे ही कॉलेज में व्याख्याता थी... मैं राजनीती शास्त्र में सर खपाया करता था और वो छात्रों को अंग्रेजी साहित्य की सुन्दरता से रूबरू करवाया करती... हालाँकि हम दोनों के विषय एक दुसरे से विपरीत थे... मगर उससे भी ज्यादा हम विपरीत थे... वो राजनीती सी नीरस थी और मैं साहित्य सा रोमांटिक... पर फिर भी पाता नहीं क्यूँ... पहली मुलाकात से इस आखिरी मुलाकात तक कभी लगा ही नहीं की हम अलग भी है...
कॉलेज हो या घर वो अक्सर अपने में ही खोई रहती.... ना खुद अपने खोल से बाहर आती ना किसी को अपनी जिंदगी में झांकने देती... पर उसने मुझसे कभी कुछ नही छिपाया... उसके हर दुःख उसकी हर ख़ुशी में मैं शरीक होता ही था... उसके लिए मैं एक अज़ीज़ दोस्त था और वो मेरे लिए जीवन की पूर्णता... शायद उसको भी मेरे एहसासों का भान था... मगर उसने ना कभी खुद दोस्ती की लाइन को तोडा ना कभी मुझे तोड़ने दिया.... मैं जब भी उससे साथ रहने की बात करता तो वो हंस के टाल जाती मगर उस दिन ......



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तेरी खुशबू से भीगा एक एहसास मेरे पास रखा है,
जिसमे जज्ब है तेरे बालो की खुशबू,
जिसमे जमा है तेरे जिस्म का एहसास,
ना जाने कितनी बार तुने उसे छुआ होगा,
ना मालूम कितने बरस वो तेरे हसीं बालो को संभाले रहा...
उसी की बदोलत मैं हर पल तेरे साथ होने का एहसास रखता हूँ,
उसे अपने सीने पे रख कर तेरी गर्म सांसो को महसूस करता हूँ,







... कभी समय मिले तो सम्भाल लेना,
तुम्हारा क्ल्चर अब भी मेरे बुतखाने में रखा है॥ 



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एक बेटी के पढने से दो घरों में उजाला फैलता है... हम हर हाल में अपनी बेटियों को पढाना ही चाहिए। स्टेज से मंत्रीजी का जोशीला भाषण सुनकर जनता धन्य हो रही थी। स्टेज के नीचे बैठे लोग फुसफुसा रहे थे... हमारे मंत्रीजी कितने अच्छे है.. लडके लडकियों में बिलकुल भी फर्क नहीं करते है।
भाषण के बाद सरकारी स्कूल की लडकियों की स्कूल ड्रेस और किताबों के लिए पचास हजार रूपये की राशि दान देकर जैसे ही मंत्रीजी घर लौटे। पत्नी ने उनके सामने बेटी का एडमिशन फॉर्म रख दिया... कहा... आज आखिरी तारीख है दाखिले की... आप इस पर साईन कर दिजिए... नहीं तो बेटी का एमबीए रह जाएगा...
अरे तो उसे एमबीए करके कौनसा तीर मारना है... आखिर जाएगी तो तो पराए घर ही ना...
और तू भी बात बात मै उसकी पक्ष लेकर उसे सर पर चढाना छोड दे... वरना एक हाथ पडा नहीं कि सारा दिमाग ठिकाने लग जाएगा...
मंत्रीजी का पारा सातवें आसमान पर चढ चुका था।... अपने कमरे मै जाते जाते फरमान सुना गए.. मै कमरे में जा रहा हूं, खाना वहीं भिजवा देना... और हां, मेरा सामान पैक कर देना... दो दिन के लिए दिल्ली जाना है...
और थोडी देर बात मंत्रीजी खाना खाकर सो गए... आखिर उन्हे अगले दिन दिल्ली में बालिका शिक्षा को बढावा देने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा स्वतन्त्रता दिवस पर प्रधानमंत्री द्वारा सम्मानित जो किया जाना था।
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हर लम्हा बस मै ही गलत, हर पल बस मेरी ही शिकायते
सच कहा था तुमने नन्दिनी...... रिश्ते दुख देते है...

आप क्यों मुझे फिर से रिश्तों के जंजाल में बांधने की कोशिश कर रहे हो... मेरे पिछले अनुभव मुझे यही सीखाते है कि ये रिश्ते बस दुख देते है, इसके सिवा कुछ नहीं.... यही जवाब दिया था नन्दिनी ने जब मैने दबी जबान में उससे अपनी चाहत का इज़हार किया था। हालांकि उसके अपने तर्क थे जो अपनी जगह सौ फीसदी सही भी थे। पर जो दिमाग की बात को मान ही ले फिर वो दिल ही क्या...
हम दोनो एक ही जगह काम किया करते थे... काम क्या करते थे बस एक दूसरे का साथ देते देते वहां कैसे साल दर साल बीत गए पता ही नहीं चला। इस बीच हम दोनो को ही दूसरी तमाम जगहों से इससे बेहतर काम करने के ऑफर मिले, पर इस साथ की खातिर दोनो की उन्हे ठुकराते चले गए। नन्दिनी और मेरा साथ इस ऑफिस में पहले दिन से ही था, इस नई जगह पर संभवतया हम दोनो की एक दूसरे के पहले परिचित थे। दुनियावी नजरों के अनुसार वो मुझसे करीबन १५ बरस बडी थी.. इतना ही हममे वो तमाम खाईयां मौजूद थी जिन्हे पाट पाना कमअसकम मेरे लिए तो मुमकिन नहीं था। मगर ना जाने क्यों कई बार कोशिश करने के बाद भी जब मै नन्दिनी से दूरी ना बना पाया तो मैने एक रात उनसे हिम्मत करके अपना हाले दिल उन्हे बता ही दिया.... हालांकि मैने जिस साफगोई से उनसे अपने मन की बात कही.. उसकी वो हो ना हो मै जरूर कायल हो गया था।
उनसे बात करते समय.. हर बात कहते समय मुझे मालूम था कि ये मुमकिन नहीं,,, पर फिर भी ना मालूम नींद के आगोश में या फिर किस जोश में मैने अपने दिल की परतें प्याज की मानिन्द उनके सामने खोल के रख दी। सब कुछ सुनने के बाद उस समय तो उन्होने कुछ नहीं कहा... परन्तु अगले दिन उन्ही सब तमाम बातों के साथ जिन्हे मै पहले से जानता था.... इस नए रिश्ते का बोझ उठाने से इंकार कर दिया... और साथ ही मुझे जिन्दगी भर के लिए अपनी दोस्ती का रिश्ता खैरात में दे दिया। हालांकि मेरा शुरू से मानना था कि इस संसार में शायद दोस्ती से बडा नाता कोई नहीं मगर ना जाने क्यों आज ये ही रिश्ता मुझे खैरात सा लग रहा था... संभवतया इसकी वजह वो अहसास था जो मै पहले दिन से ही नन्दिनी से जोड बैठा था... और वो इस बातों से अनजान... बस अपनी दोस्ती निभा रही थी...
सच कहा था तुमने नन्दिनी... रिश्ते बस दुख देते है
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