इस बार आप लोगो के लिए पेश है एक बिलकुल नए कवि "राजेश उपाध्याय" की कवितायेँ... राजेश जी का परिचय फ़िलहाल इतना है की वे मेरे साथ ही काम करते है... कवितायेँ लिखने का शौक तो उन्हें अरसे से है, परन्तु अब तक जो भी लिखा वो अपने लिए ही लिखा... ये पहली बार है जब उनका लिखा कुछ किसी सार्वजनीक मंच पर है... लिहाज़ा आप लोगो की प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा....








बहस
एक दिन मैं चुपचाप बैठा था,
बाहर की दुनिया और
अन्दर के संसार में
बहस छिड़ गयी
मैं तो चुपचाप बैठा था
कुछ टुटा, कुछ चटका
कुछ गिरा, कुछ उठा
पानी बहने लगा
बादल उड़ रहे थे
कभी लहरें उछली
तो कभी पत्थर अटके
बहस बढती ही गयी
लेकिन मैं तो चुपचाप बैठा था
फिर लाइट बंद करके
मैं देखने लगा
और सब कुछ साफ
दिखाई देने लगा

बदलाव
सूखे पत्ते की कहानी सुनकर
भीगी मिटटी से बतियाकर
चिड़िया की फुदकन देखकर
सांप की केंचुली छूकर
धुप को सिमटते देखकर
पेड़ों से इतिहास पूछकर
मैंने "बदलाव" के बारे में
सोचना शुरू किया
आप भी सोचियेगा......



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