पहले पहल मेरे लिए सुन्दरता के मायने की कुछ और थे
मसलन तब किसी स्त्री की मांसलता मुझे लुभाती थी
किसी का गौरवर्ण मुझे सहज आकर्षित कर लेता था
और अक्सर ही कृत्रिमता मुझे आसानी से प्रभावित कर देती थी,
फिर मैं तुमसे मिला,
संभवतया ये घटना मेरे जीवन की मधुर स्मृतियों में श्रेष्ठ है,
इसका घटना मेरे जीवन में किसी उत्सव सा स्मरणीय है
और फिर, मेरे लिए सुन्दरता के मायने बदलने लगे
तुम्हारे साथ बिताया हर पल मुझे लुभाने लगा
तुम्हारी सादगी असर करने लगी
और हाँ, वो जो तुम हाथ में दो कड़े पहनती थी ना,
वो भी मुझे बहुत पसंद थे
और अब जब तुम मेरे साथ नहीं हो, तब भी
सुन्दरता को महसूस करने का मेरा तरीका वही है
जो तुमने मुझे सिखाया था
वही जो बच्चो की मुस्कान में नज़र आता है
जो बारिश की बूंदों सा, हर किसी के मन को हर्षाता है
वो जो घोर उदासी में भी होंठो पर एक मुस्कान छोड़ जाता है
और हाँ, सबसे अहम् तो वो है की अब कोई कृत्रिमता मुझे प्रभावित नहीं करती है
क्यूंकि मैं जान गया हूँ की असल जीवन में इसका कोई मोल ही नहीं है

© कमल किशोर जैन ( 02 अक्टूबर, 2013)


 


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कैसा लगा.. 

गाँधी, तुम थे ये मानना ज़रा दुष्कर हो चला है मेरे लिए
आजकल कौन किसी के कहने से यूँ सब कुछ छोड़ छाड़ कर चल देता है
अब कौन किसी के थप्पड़ मरने पर अपना दूसरा गाल भी आगे कर देता है
बापू! अब कहा केवल अहिंसा के दम पर दुश्मनों को शिकस्त दे पाना मुमकिन है
अब कहा तुम सा समर्पण और धैर्य ला पाना संभव है
ना जाने कैसे तुमने उन मुर्दों में जान फूंकी होगी
जाने कैसे उनमे देशप्रेम का ज़ज्बा डाला होगा
ये तुमसे ही संभव था जो एक लाठी के दम पर अंग्रेजो को खदेड़ पाए
ये तुमसे ही संभव था जो पाठ अहिंसा का हमको सीखा पाए
बापू! तुम युग नियंता थे, तुम सर्जक थे इस नए भारत के
जो स्वप्न तुमने दिखाए थे आज़ादी की उस अलसभोर में हमको
अफ़सोस उन सपनो को जाने कहीं बिसरा दिया है हमने
और धिक्कार है हम पर, जो संजो नहीं पाए तुम्हारे आदर्शो को
सुना है, आजकल तुम्हारे बलिदान पर भी लोग अंगुलिय उठाने लगे है

 
© कमल किशोर जैन ( 02 अक्तूबर, 2013 )


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कैसा लगा.. 

मुझे हमेशा से ही पसंद थे लाल पीले रंग,
बारिश में भीगना, वो मिट्ठी की सौंधी महक
छोटे बच्चो से घंटों धींगा मस्ती करना..
उन्हें परेशान करना
जाड़ों की सर्द सुबहो में
पापा के साथ उनकी रजाई में दुबके पड़े रहना
गर्मियों की दोपहरी में औंधे पड़े कॉमिक्स पढना
अपनी गन्दी सी ड्राइंग पर इतराना
दोस्तों से ज़रा ज़रा सी बात पर नाराज़ हो जाना..
अपनी बात मनवाने के लिए सीरियस हो बड़े बड़े लोजिक देना.
और फिर थक हार कर खाने को मना कर देना
पकड़ा जाऊंगा ये जानते हुए भी माँ से झूट बोलना

सब कुछ मुझे भी बहुत पसंद था..
मगर पता ही नहीं चला की
इस जिंदगी की उधेड़बुन में
हम कब बड़े हो गए..
और..

दिल को सुकून देनी वाली वो तमाम बाते..
बचकानी हो गयी


© कमल किशोर जैन (16 सितम्बर 2013 )




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कैसा लगा.. 

इन्होने भगवा को छीना,
उन्होंने हरे को..  
मैंने सफ़ेद चुना,  
और शांति से जिया..

इन्होने मदरसों में आतंक की घुट्टी दी,  
उन्होंने सरस्वती के मंदिरों में जहर भरा..  
भला हुआ जो 
मैं निपट अज्ञानी रहा.

मौलाना अजान में डूबे रहे,  
पंडित जी ठाकुर के भोग में..  
उधर वो बच्ची 
भूख से तड़प कर मर गयी

इन्होने विधर्मियों को मारा  
उन्होंने काफिरो को  
मैंने इंसानियत को चुना..  
मैं बेबस हर रोज मरा..

इन्होने गोधरा चुना
उन्होंने मुजफ्फरनगर उजाडा
मुझे शांति की तलाश थी... 
जो किसी मासूम की मुस्कान में मिली.



© कमल किशोर जैन (12 सितम्बर 2013)
 





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