बहुत प्रसिद्द कविता है सुनील जोगी जी की, उसी की तर्ज पर ये लिखी गयी है.. और इसकी शुरुआत हुई अंकित शुक्ला  के एक पोस्ट पर किये गए कमेन्ट से.. तो आप भी आनंद लीजिए #नए_दौर_के_उपमान का (बिना, ओरिजनल से कम्पेयर किये.. वो तो लिजेंड है)
..
तुम सलमान सरीखी मुजरिम हो
मैं आसाराम की बेल प्रिये

.
तुम विजय माल्या सी हो डिफाल्ट
मैं हूँ किसान का लोन प्रिये!!

.
तुम अंडरटेकर सी विराट
मैं हुआ डोप में फेल प्रिये.

.
तुम अंडरटेकर सी विराट
मैं हुआ डोप में फेल प्रिये.

.
तुम दौड़ो मेट्रो सी सरपट
मैं धक्का स्टार्ट लो फ्लोर प्रिये!!

.
तुम कृष्ण जन्म हो प्राण प्रिये
मैं भीष्म पितामह की शर शैय्या
.

तुम सावन की मस्त फुहारों सी,
मैं जेठ माह की धुप प्रिये!!
.

तुम एमबीए हो आईआईएम से,
मैं संस्कार से बी.एड प्रिये!!

.
तुम वाकपटु मोदी जैसी,
मैं मनमोहन का मौन प्रिये!!


(Series Continue...)


© कमल किशोर जैन (25 अगस्त, 2016)


और हाँ, साथ में ये ओरिजनल वाली भी सुनिए..
https://www.youtube.com/watch?v=cCqAYaqPK_k&spfreload=5
0 संदेश |
कैसा लगा.. 

मैं खता दर खता करता रहा,
वो मुस्कुरा कर माफ़ करते रहे..

मेरे तमाम ज़ुल्मो का
वो यूँ हिसाब करते रहे..

चले जाना था जिस दिन हमें उनकी ज़दों से इलाही
उसी रात वो सजदे में सर झुकाते चले गए..

माँगा तो हमने भी था उन्हें अपनी फरियादो में
वो जाने क्या क्या हम पर लुटाते चले गए.

सुना है वो अब भी गुम है मोहब्बत की उन हसीं यादो में
हम जिंदगी के रोजगार में खुद को भुला गए 
.
© कमल किशोर जैन (23 दिसंबर, 2015)

शीर्षक , , , 0 संदेश |
कैसा लगा.. 
वो रात भला क्या रात हुई
जिस रात में तेरा जिक्र नहीं...

वो दिन भला क्योकर निकले
जिस दिन में तेरा संग नहीं..

उस धड़कन को क्या कहिये
जिस धड़कन में तेरा नाम नहीं..


उस पल की कीमत क्या होगी
जिस पल में तुम्हारा साथ नहीं,

वो जनम अकारथ ही बीते
जिस जनम में तेरा साथ नहीं..

.
© कमल किशोर जैन (21 दिसंबर, 2015)
ये सरपट दौड़ती जिंदगी,
पीछे छूटते रिश्ते
आने वाले पड़ाव.
सब कुछ हर पल बदलता सा
जो नहीं बदला
वो तुम हो
जीवन में जहाँ थे
बस वहीँ हो..


(एक छोटी कविता)
शीर्षक , , 0 संदेश |
कैसा लगा.. 
लाख कोशिशो के बाद भी
ना जाने क्यूँ मेरे मन से
नहीं मिट पाते है
तुम्हारी छुअन के निशान...

मेरे शरीर, मेरे अंतस
हर कहीं और
जहाँ तक है मेरा वजूद
वहां तक मौजूद है
तुम्हारी छुअन के निशान...

पहले पहल मेरे लिए सुन्दरता के मायने की कुछ और थे
मसलन तब किसी स्त्री की मांसलता मुझे लुभाती थी
किसी का गौरवर्ण मुझे सहज आकर्षित कर लेता था
और अक्सर ही कृत्रिमता मुझे आसानी से प्रभावित कर देती थी,
फिर मैं तुमसे मिला,
संभवतया ये घटना मेरे जीवन की मधुर स्मृतियों में श्रेष्ठ है,
इसका घटना मेरे जीवन में किसी उत्सव सा स्मरणीय है
और फिर, मेरे लिए सुन्दरता के मायने बदलने लगे
तुम्हारे साथ बिताया हर पल मुझे लुभाने लगा
तुम्हारी सादगी असर करने लगी
और हाँ, वो जो तुम हाथ में दो कड़े पहनती थी ना,
वो भी मुझे बहुत पसंद थे
और अब जब तुम मेरे साथ नहीं हो, तब भी
सुन्दरता को महसूस करने का मेरा तरीका वही है
जो तुमने मुझे सिखाया था
वही जो बच्चो की मुस्कान में नज़र आता है
जो बारिश की बूंदों सा, हर किसी के मन को हर्षाता है
वो जो घोर उदासी में भी होंठो पर एक मुस्कान छोड़ जाता है
और हाँ, सबसे अहम् तो वो है की अब कोई कृत्रिमता मुझे प्रभावित नहीं करती है
क्यूंकि मैं जान गया हूँ की असल जीवन में इसका कोई मोल ही नहीं है

© कमल किशोर जैन ( 02 अक्टूबर, 2013)


 


शीर्षक , , , 0 संदेश |
कैसा लगा..