यूँ तमाम कोशिशो के बाद हम दो से एक हुए थे..
अब मुद्दते गुज़रेगी फिर से दो हो जाने मे...
कमल हम साथ नहीं रह सकते... मैं अपने परिवार को नहीं छोड़ सकती... भले उसी की खातिर मगर मुझे फिर से उसी घर में जाना पड़ेगा जहाँ मेरा दम घुटता है.... जहाँ हर पल मुझ से मेरे होने का एहसास छिना जाता है... मैं कहीं भी किसी भी हालत में रह सकती हूँ... मगर मेरे परिवार की खातिर मुझे ये समझोता करना पड़ेगा... और मैं कम से कम तुमसे तो ये उम्मीद कर सकती हु की तुम तो मुझे समझोगे... और अगर हो सके तो मुझे भुला देना... नंदिनी के ये आखिरी शब्द आज पांच साल बाद भी मेरे कानो में गूंजते रहते है... सब कुछ जानते हुए भी मैं कदम दर कदम बस उसी का होता गया था। हालाँकि उसने मुझे हमेशा समझाया की मैं उसे ज्यादा सीरियस ना लू... क्यूँ उसकी लाइफ में सब कुछ अनसर्टेन है... कब क्या होगा खुद उसे भी नहीं मालूम...
दरअसल नंदिनी की शादी उसके घरवालो ने उम्र के उस दौर में ही कर दी थी जब शायद उसे इसका मतलब भी मालूम नहीं था... नंदिनी... मेरे साथ मेरे ही कॉलेज में व्याख्याता थी... मैं राजनीती शास्त्र में सर खपाया करता था और वो छात्रों को अंग्रेजी साहित्य की सुन्दरता से रूबरू करवाया करती... हालाँकि हम दोनों के विषय एक दुसरे से विपरीत थे... मगर उससे भी ज्यादा हम विपरीत थे... वो राजनीती सी नीरस थी और मैं साहित्य सा रोमांटिक... पर फिर भी पाता नहीं क्यूँ... पहली मुलाकात से इस आखिरी मुलाकात तक कभी लगा ही नहीं की हम अलग भी है...
कॉलेज हो या घर वो अक्सर अपने में ही खोई रहती.... ना खुद अपने खोल से बाहर आती ना किसी को अपनी जिंदगी में झांकने देती... पर उसने मुझसे कभी कुछ नही छिपाया... उसके हर दुःख उसकी हर ख़ुशी में मैं शरीक होता ही था... उसके लिए मैं एक अज़ीज़ दोस्त था और वो मेरे लिए जीवन की पूर्णता... शायद उसको भी मेरे एहसासों का भान था... मगर उसने ना कभी खुद दोस्ती की लाइन को तोडा ना कभी मुझे तोड़ने दिया.... मैं जब भी उससे साथ रहने की बात करता तो वो हंस के टाल जाती मगर उस दिन ......



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कैसा लगा.. 

तेरी खुशबू से भीगा एक एहसास मेरे पास रखा है,
जिसमे जज्ब है तेरे बालो की खुशबू,
जिसमे जमा है तेरे जिस्म का एहसास,
ना जाने कितनी बार तुने उसे छुआ होगा,
ना मालूम कितने बरस वो तेरे हसीं बालो को संभाले रहा...
उसी की बदोलत मैं हर पल तेरे साथ होने का एहसास रखता हूँ,
उसे अपने सीने पे रख कर तेरी गर्म सांसो को महसूस करता हूँ,







... कभी समय मिले तो सम्भाल लेना,
तुम्हारा क्ल्चर अब भी मेरे बुतखाने में रखा है॥ 



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कैसा लगा.. 
एक बेटी के पढने से दो घरों में उजाला फैलता है... हम हर हाल में अपनी बेटियों को पढाना ही चाहिए। स्टेज से मंत्रीजी का जोशीला भाषण सुनकर जनता धन्य हो रही थी। स्टेज के नीचे बैठे लोग फुसफुसा रहे थे... हमारे मंत्रीजी कितने अच्छे है.. लडके लडकियों में बिलकुल भी फर्क नहीं करते है।
भाषण के बाद सरकारी स्कूल की लडकियों की स्कूल ड्रेस और किताबों के लिए पचास हजार रूपये की राशि दान देकर जैसे ही मंत्रीजी घर लौटे। पत्नी ने उनके सामने बेटी का एडमिशन फॉर्म रख दिया... कहा... आज आखिरी तारीख है दाखिले की... आप इस पर साईन कर दिजिए... नहीं तो बेटी का एमबीए रह जाएगा...
अरे तो उसे एमबीए करके कौनसा तीर मारना है... आखिर जाएगी तो तो पराए घर ही ना...
और तू भी बात बात मै उसकी पक्ष लेकर उसे सर पर चढाना छोड दे... वरना एक हाथ पडा नहीं कि सारा दिमाग ठिकाने लग जाएगा...
मंत्रीजी का पारा सातवें आसमान पर चढ चुका था।... अपने कमरे मै जाते जाते फरमान सुना गए.. मै कमरे में जा रहा हूं, खाना वहीं भिजवा देना... और हां, मेरा सामान पैक कर देना... दो दिन के लिए दिल्ली जाना है...
और थोडी देर बात मंत्रीजी खाना खाकर सो गए... आखिर उन्हे अगले दिन दिल्ली में बालिका शिक्षा को बढावा देने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा स्वतन्त्रता दिवस पर प्रधानमंत्री द्वारा सम्मानित जो किया जाना था।
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हर लम्हा बस मै ही गलत, हर पल बस मेरी ही शिकायते
सच कहा था तुमने नन्दिनी...... रिश्ते दुख देते है...

आप क्यों मुझे फिर से रिश्तों के जंजाल में बांधने की कोशिश कर रहे हो... मेरे पिछले अनुभव मुझे यही सीखाते है कि ये रिश्ते बस दुख देते है, इसके सिवा कुछ नहीं.... यही जवाब दिया था नन्दिनी ने जब मैने दबी जबान में उससे अपनी चाहत का इज़हार किया था। हालांकि उसके अपने तर्क थे जो अपनी जगह सौ फीसदी सही भी थे। पर जो दिमाग की बात को मान ही ले फिर वो दिल ही क्या...
हम दोनो एक ही जगह काम किया करते थे... काम क्या करते थे बस एक दूसरे का साथ देते देते वहां कैसे साल दर साल बीत गए पता ही नहीं चला। इस बीच हम दोनो को ही दूसरी तमाम जगहों से इससे बेहतर काम करने के ऑफर मिले, पर इस साथ की खातिर दोनो की उन्हे ठुकराते चले गए। नन्दिनी और मेरा साथ इस ऑफिस में पहले दिन से ही था, इस नई जगह पर संभवतया हम दोनो की एक दूसरे के पहले परिचित थे। दुनियावी नजरों के अनुसार वो मुझसे करीबन १५ बरस बडी थी.. इतना ही हममे वो तमाम खाईयां मौजूद थी जिन्हे पाट पाना कमअसकम मेरे लिए तो मुमकिन नहीं था। मगर ना जाने क्यों कई बार कोशिश करने के बाद भी जब मै नन्दिनी से दूरी ना बना पाया तो मैने एक रात उनसे हिम्मत करके अपना हाले दिल उन्हे बता ही दिया.... हालांकि मैने जिस साफगोई से उनसे अपने मन की बात कही.. उसकी वो हो ना हो मै जरूर कायल हो गया था।
उनसे बात करते समय.. हर बात कहते समय मुझे मालूम था कि ये मुमकिन नहीं,,, पर फिर भी ना मालूम नींद के आगोश में या फिर किस जोश में मैने अपने दिल की परतें प्याज की मानिन्द उनके सामने खोल के रख दी। सब कुछ सुनने के बाद उस समय तो उन्होने कुछ नहीं कहा... परन्तु अगले दिन उन्ही सब तमाम बातों के साथ जिन्हे मै पहले से जानता था.... इस नए रिश्ते का बोझ उठाने से इंकार कर दिया... और साथ ही मुझे जिन्दगी भर के लिए अपनी दोस्ती का रिश्ता खैरात में दे दिया। हालांकि मेरा शुरू से मानना था कि इस संसार में शायद दोस्ती से बडा नाता कोई नहीं मगर ना जाने क्यों आज ये ही रिश्ता मुझे खैरात सा लग रहा था... संभवतया इसकी वजह वो अहसास था जो मै पहले दिन से ही नन्दिनी से जोड बैठा था... और वो इस बातों से अनजान... बस अपनी दोस्ती निभा रही थी...
सच कहा था तुमने नन्दिनी... रिश्ते बस दुख देते है
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