हर लम्हा बस मै ही गलत, हर पल बस मेरी ही शिकायते
सच कहा था तुमने नन्दिनी...... रिश्ते दुख देते है...

आप क्यों मुझे फिर से रिश्तों के जंजाल में बांधने की कोशिश कर रहे हो... मेरे पिछले अनुभव मुझे यही सीखाते है कि ये रिश्ते बस दुख देते है, इसके सिवा कुछ नहीं.... यही जवाब दिया था नन्दिनी ने जब मैने दबी जबान में उससे अपनी चाहत का इज़हार किया था। हालांकि उसके अपने तर्क थे जो अपनी जगह सौ फीसदी सही भी थे। पर जो दिमाग की बात को मान ही ले फिर वो दिल ही क्या...
हम दोनो एक ही जगह काम किया करते थे... काम क्या करते थे बस एक दूसरे का साथ देते देते वहां कैसे साल दर साल बीत गए पता ही नहीं चला। इस बीच हम दोनो को ही दूसरी तमाम जगहों से इससे बेहतर काम करने के ऑफर मिले, पर इस साथ की खातिर दोनो की उन्हे ठुकराते चले गए। नन्दिनी और मेरा साथ इस ऑफिस में पहले दिन से ही था, इस नई जगह पर संभवतया हम दोनो की एक दूसरे के पहले परिचित थे। दुनियावी नजरों के अनुसार वो मुझसे करीबन १५ बरस बडी थी.. इतना ही हममे वो तमाम खाईयां मौजूद थी जिन्हे पाट पाना कमअसकम मेरे लिए तो मुमकिन नहीं था। मगर ना जाने क्यों कई बार कोशिश करने के बाद भी जब मै नन्दिनी से दूरी ना बना पाया तो मैने एक रात उनसे हिम्मत करके अपना हाले दिल उन्हे बता ही दिया.... हालांकि मैने जिस साफगोई से उनसे अपने मन की बात कही.. उसकी वो हो ना हो मै जरूर कायल हो गया था।
उनसे बात करते समय.. हर बात कहते समय मुझे मालूम था कि ये मुमकिन नहीं,,, पर फिर भी ना मालूम नींद के आगोश में या फिर किस जोश में मैने अपने दिल की परतें प्याज की मानिन्द उनके सामने खोल के रख दी। सब कुछ सुनने के बाद उस समय तो उन्होने कुछ नहीं कहा... परन्तु अगले दिन उन्ही सब तमाम बातों के साथ जिन्हे मै पहले से जानता था.... इस नए रिश्ते का बोझ उठाने से इंकार कर दिया... और साथ ही मुझे जिन्दगी भर के लिए अपनी दोस्ती का रिश्ता खैरात में दे दिया। हालांकि मेरा शुरू से मानना था कि इस संसार में शायद दोस्ती से बडा नाता कोई नहीं मगर ना जाने क्यों आज ये ही रिश्ता मुझे खैरात सा लग रहा था... संभवतया इसकी वजह वो अहसास था जो मै पहले दिन से ही नन्दिनी से जोड बैठा था... और वो इस बातों से अनजान... बस अपनी दोस्ती निभा रही थी...
सच कहा था तुमने नन्दिनी... रिश्ते बस दुख देते है
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