सच कितना मजबूर है मेरा प्रेम...
और उतनी ही निष्ठुर तुम
जितना मुझसे ये करीब होता जाता है
तुम मुझसे उतनी ही दूर चली जाती हो

....और मेरे पास रह जाते है
फकत तेरी यादों के साये..
चंद अल्फाज़.. और आँखों में ये नमी






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कैसा लगा.. 

जानता था कभी मूर्त रूप ले ही नहीं पाएगा हमारा प्रेम

हालाँकि मैंने तुमसे ही जानी थी छुअन प्यार की

गाहे बेगाहे यूँ ही छू लिया करता था तुम्हे

मेरी सांसो में अब भी बसी है तुम्हारे बदन की खुशबू



अपने तमाम समर्पण के बावजूद जानता था

कभी तुम पर कोई हक नहीं जाता पाउँगा

क्यूँ की ये हक ना जाने क्यूँ

तुमने अनायास ही दे दिया था किसी और को



हालाँकि प्रेम का उन्माद तुम पर भी तारी था

मगर हमारा ये सभ्य और सुसंस्कृत समाज

किसी इंसान को दो बार प्रेम करने की इजाजत नही देता

और गलती से वो इंसान "स्त्री" हो


.....तो कतई नहीं.... हरगिज़ नहीं


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