मुझे हमेशा से ही पसंद थे लाल पीले रंग,
बारिश में भीगना, वो मिट्ठी की सौंधी महक
छोटे बच्चो से घंटों धींगा मस्ती करना..
उन्हें परेशान करना
जाड़ों की सर्द सुबहो में
पापा के साथ उनकी रजाई में दुबके पड़े रहना
गर्मियों की दोपहरी में औंधे पड़े कॉमिक्स पढना
अपनी गन्दी सी ड्राइंग पर इतराना
दोस्तों से ज़रा ज़रा सी बात पर नाराज़ हो जाना..
अपनी बात मनवाने के लिए सीरियस हो बड़े बड़े लोजिक देना.
और फिर थक हार कर खाने को मना कर देना
पकड़ा जाऊंगा ये जानते हुए भी माँ से झूट बोलना

सब कुछ मुझे भी बहुत पसंद था..
मगर पता ही नहीं चला की
इस जिंदगी की उधेड़बुन में
हम कब बड़े हो गए..
और..

दिल को सुकून देनी वाली वो तमाम बाते..
बचकानी हो गयी


© कमल किशोर जैन (16 सितम्बर 2013 )




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कैसा लगा.. 

इन्होने भगवा को छीना,
उन्होंने हरे को..  
मैंने सफ़ेद चुना,  
और शांति से जिया..

इन्होने मदरसों में आतंक की घुट्टी दी,  
उन्होंने सरस्वती के मंदिरों में जहर भरा..  
भला हुआ जो 
मैं निपट अज्ञानी रहा.

मौलाना अजान में डूबे रहे,  
पंडित जी ठाकुर के भोग में..  
उधर वो बच्ची 
भूख से तड़प कर मर गयी

इन्होने विधर्मियों को मारा  
उन्होंने काफिरो को  
मैंने इंसानियत को चुना..  
मैं बेबस हर रोज मरा..

इन्होने गोधरा चुना
उन्होंने मुजफ्फरनगर उजाडा
मुझे शांति की तलाश थी... 
जो किसी मासूम की मुस्कान में मिली.



© कमल किशोर जैन (12 सितम्बर 2013)
 





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कैसा लगा.. 
मैं अक्सर सोचा करता था की
खुशियाँ यूँ ही नहीं आती है... बेमकसद
ना ही कोई मुक्कमल तरीका है
हमेशा खुश रहने का
भले कोई लाख जतन कर ले
मगर हमेशा खुश रहना
किसी के बस की बात नहीं... किसी के
मगर मैं गलत था
यक़ीनन सौ फीसदी गलत
दरअसल बड़ा आसान है खुश रहना
उपरवाले ने छोटी छोटी चीजो में हमें
ये ख़ुशी की नियामत बख्शी है
मसलन कभी क्लास से बंक मारने की भी एक ख़ुशी है
दोस्तों के साथ घूमना, घंटो किताबे पढ़ना
गाने गुनगुनाना, फ़िल्में देखना
कभी "उनके" साथ होना, कभी "उनके" बिना होना
हर छोटी से छोटी बात में खुशियाँ छिपी होती है
कभी बच्चो की धींगा मस्ती में
तो कभी उनके बेवजह इतराने में भी
वो कभी माँ के हाथ की चपातियों में होती है
कभी मिटटी की सौंधी सी महक में
जिन यादों पर आंसू निकला करते थे
कभी उन्ही यादो में भी छिपी होती है ख़ुशी
ऐसी ही न जाने कितनी अनगिनत छोटी छोटी बातों में
छिपी होती है जीवन की खुशिया
ये तो बस हम ही है,
जो उन्हें ढूंढ नहीं पाते
और यूँ ही बेमतलब
दुखो को जीवन भर लादे फिरते है..

...बेमकसद

© कमल किशोर जैन (3 सितम्बर, 2013)





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