हिंदी कविता संसार की दुनिया में शायद दुष्यंत कुमार के बाद सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले  कवी अदम गोंडवी जी की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना. भले सरकारे कितने दावे कर ले... भले लोग समानता की कितनी ही बाते कर ले... जब जब गोंडवी जी की ये रचना पढ़ता हूँ... लगता है आज भी यही हकीकत है हमारे गाँवो की... आज भी यही मानसिकता है हमारे समाज की... पेश है  राम नाथ सिंह ' अदम गोंडवी ' की ये रचना .....

आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी कि कुएँ में डूब कर

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा

कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई

कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है

थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को

डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से

आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में

होनी से बेखबर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी

चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई

दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया

और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज़ में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में

जुड़ गई थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था

बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है

कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएँगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं

कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें

बोला कृष्ना से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से

पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में

दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर

क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया

कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो

देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारो के यहाँ
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ

जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है

भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाँहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ

आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई

वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही

जानते हैं आप मंगल एक ही मक़्क़ार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है

कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज़्ज़त रहे्गी आपकी

बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया था

क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था

रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था

सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में

घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
"जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने"

निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर

गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर "माल वो चोरी का तूने क्या किया"

"कैसी चोरी, माल कैसा" उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस होश फिर जाता रहा

होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -

"मेरा मुँह क्या देखते हो ! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो"

और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी

दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था

घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे

"कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं"

यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से

फिर दहाड़े, "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा

इक सिपाही ने कहा, "साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"

बोला थानेदार, "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो

ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है, जेल है"

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
"कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल"

उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को

धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को

मैं निमंत्रण दे रहा हूँ- आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में

गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही

हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए !
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मेरी जबां पर था उसको भरोसा इतना,
मुझसे खुदको भुला देने की दुहाई ले ली,

कैसे बयां हो सितमगर के सितम,
छीन के हंसी इन लबों की हंसने की दुहाई ले ली.

यूँ रो के गुज़र दी शब हमने आँखों ही आँखों में,
के बेदर्द कहीं रोने की भी न मनाही कर दे.

यूँ बयां हुई गम-ए-दौरान की हकीकत,
संग तो रहा सनम, मगर संगे दिल बनकर 







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कैसा लगा.. 
तुम कहती हो की तुम्हे मुझसे प्यार नहीं है..
ठीक ही होगा....

क्या हुआ जो मेरा दुःख तुम्हारी पलकें भिगो देता है,
क्या हुआ जो मेरी नाराजगी तुम्हे सताती है,

क्यूँ फरक पड़ता है तुमको रूठ जाने से मेरे ,
क्यूँ मेरी चिंता में पड़ते है पेशानी पर बल तेरे,

यूँ ही करती होंगी तुम फ़िक्र मेरी शामो-सहर,
यूँ ही बांटे होंगे मुझसे रंजो-गम अपने,

क्यूंकि हमेशा सच ही तो कहती हो तुम,
ये भी सच ही होगा की.... तुमको मुझसे प्यार नहीं.


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कैसा लगा.. 
(दुष्यंत जी की लिखी ये कविता मेरे साथ मेरे अज़ीज़तम कुछ ओर लोगो को बहुत पसंद है. इसलिए जब उनसे दिल की बात कहने का मोका आया तो इसका सहारा लेने से खुद को रोक नही पाया. कविता का मूल भाव दुष्यंत जी का ही है.... मैने बस अपने मन की बात कहने के लिए उनके शब्दों मे कुछ हेर फेर किया है... जिसके लिए मैं दुष्यंत जी से क्षमाप्रार्थी हूँ.)

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ
मेरा वो प्यार आपको बताता हूँ

एक समंदर सा है उसकी आँखों में
मैं जहाँ डूब जाना जाता हूँ

वो किसी रेल-सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ

हर तरफ़ ऐतराज़ होता है
मैं अगर उसके पास जाता हूँ

वो मुझसे रूठ गई है जबसे
और ज़्यादा उसके करीब पाता हूँ

मैं उसे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ

कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ








(अपने इस दुस्साहस के लिए दुष्यंत जी सहित उनके लाखो प्रशंसको से क्षमाप्रार्थी हूँ )
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आखिर हम लोग क्यूँ निराशा को बुरा मानते है. ये नैराश्य भी तो जीवन का अहम् अंग है. अगर इन्सान की जिंदगी में महज खुशियाँ ही तो शायद उसको इनके मायने भी मालूम न हो... पर अगर किसी इन्सान को लाख गम उठाने के बाद ख़ुशी की एक छोटी सी भी खबर सुने दे तो वो उसे सहरा में पानी की बूँद नजर आती है. ये निराशा और दुःख ही है जो हमें जीवन में पीछे मुड के देखना सिखाती है. हमें हमारी गलतियों का एहसास कराती है. जिन्दगी की भाग दौड़ में हम अक्सर अपने आप का विश्लेषण करना कहीं छोड़ देते है.. निराशा से भरा समय हमसे वो भी करवा देता है. लगभग यही वो समय होता है जब इन्सान अपने गुनाहों का प्रायश्चित करता है. यही वो समय है जब इन्सान अपनी खूबियों-खामियों को जानने की कोशिश करता है. यही वो समय होता है जब अपने पराये का भेद मालूम पड़ता है... यही वो समय है जब इन्सान अपने दुखो से लड़ना सीखता है... अपनी गलतियों से सबक लेकर फिर से उठ खड़ा होना सीखता है. इसलिए कहता हूँ की... नैराश्य भी हमारे जीवन का ही एक अहम अंग है. इससे दूर भागने की बजाय इसका सामना करना सीखे...






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हां तो भाई लोग, देखो जैसा की हमारी हिन्दी फिल्मों में बडे भाई, दोस्त और हितैषी राय देते है, मै भी राय दे रहा हूं कि ईश्क मौहब्बत जैसी फिजूल कि चीज से दूर ही रहों। पर अगर फिर भी तुमने ठान ही लिया है तो आज मैने भी तुमको एक लम्बा चौडा लेक्चर मारने की ठान ली है। सही भी जब बन्दे ने गाडी का एक्सीडेन्ट करने का मन बना ही लिया है तो लगे हाथ मै अपना ज्ञान झलकाने में पीछे क्यूं रहूं ?
देखो भाई लोगो.... अच्छा एक मिनट इससे पहले कि ये एनजीओ वाले मुझ पर जेण्डर बायस पर बात करने का आरोप लगा दें। मै साफ कर दूं मै बार बार भाई लोग इसलिये कह रहा हूं कि ये छिछोरापन हम लडकों के हिस्से में ही आया है इसलिये समझाना भी तो उन्हे ही पडेगा। खुदा कि नेमत से ये हसीन चेहरे तो बेचारे हमेशा से ही मासूम होते आये है। अव्वल तो बन्दे की गाडी का एक्सीडेन्ट करवाने में इनका कोई योगदान होता ही नहीं है, गर हो भी तो बाद में बडी मासूमिसयत से ये कह भर दे कि देखो जी! मै घरवालों के खिलाफ नहीं जा सकती। बस हो गया बन्दा खल्लास। इसलिये आज का ज्ञान हर वीकेन्ड पर सच्चा प्यार कर बैठने वाले भाई लोगो के नाम..
हां तो भाईयों.. देखो अगर तुमने एक बार फिरसे अपनी रातों की नींदे, अपना सुकून तबाह करने का मन बना ही लिया है तो सुनो... देखो अपना प्यार जगाने के लिए सबसे पहले शाहरूख खान की कोई अच्छी सी फिल्मे देखो... वैसे अच्छी क्या वो तो वैसे भी अपनी हर फिल्म में दूसरे की गर्लफ्रेण्ड को लेकर भागने का आदि है। क्या है ना उससे तुमको भी हौसला मिलेगा कि किसी को भी पटाया जा सकता है। फिर अपने मोबाईल में अलग अलग जोनर के गाने, गजले लोड करवाओ, पता नहीं मिलने वाली लडकी का कैसा टेस्ट हो? फिर ना शहर कि सिटी बसों में बडे शरीफ और सज्जन बनकर घूमो.. थोडा होमवर्क करो। और मालूम करो कि तुम्हारा लक्ष्य क्या है.. अर्जुन बन जाओ बेटा। और जब कोई लडकी तुम्हारे साथ अपना कीमती टाईम बर्बाद करने को तैयार हो जाए तब तुम भी कमर कसके जंगे आजादी के मैदान में कूद पडो। फिर देखना मैडम जो तुमको टोकना शुरू करेगी... ऐसा नहीं करो वैसा करो... स्मोकिंग मत किया करो, बीयर से मोटापा बढता है, मन्दिर जाने से भगवानजी आशीर्वाद देते है, तुम्हारे दोस्त अच्छे नहीं है... और जब पांच-छः महिने में पठ्ठा मिनी मुरारी बापू बन जाए तो फिर किसी रोज क्रिस्टल पाल्म में आईनोक्स थियेटर में बैठ कर मूवी देखते देखते तुमको बोलेगी, जानू! अब तुम पहले जैसे नहीं रहे। तो भाई लोग, अपने आप को बदलने के लिए तैयार हो जाओ और कूद पडो.... पर एक बात कहूं, सब करना पर कभी किसी का दिल नहीं तोडना..


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हे री मैं तो प्रेम दीवानी , मेरा दर्द न जाने कोय ,
सूली ऊपर सेज हमारी , किस विध सोवण होय |
गगन मंडल पे सेज पिया की , किस विध मिलना होय ||
घायल की गति घायल जाने , कि जिन लायी होय |
जौहरी की गत जौहरी जाने , कि जिन जौहर होय ||
दर्द की मारी बन बन डोलूं , बैद मिलिया नहीं कोय |

मीरा की प्रभु पीर मिटेगी , जब बैद सांवलिया होय ||
प्रेम में ऐसा मुकाम मिल पाना हर किसी के नसीब मे कहाँ... जहाँ "मैं" ख़तम हो जाए वहीं से सच्चे इश्क़ की शुरुआत होती है.. इसी समर्पण भाव के चलते "मीरा" को तो उसके "श्याम" मिल गये.. पर हम सब किसी ना किसी दुनियादारी के खेल मे इस कदर फँसे है की अपने कृष्ण को पाना तो दूर... उसे पहचान तक नही पाते है. दरअसल प्रेम का स्वरूप ही इतना उद्दात है की उसमे व्यक्ति का अहंकार, उसका Ego सब मिट जाते है. पर उसके लिए जरुरी है की प्रेम में समर्पण का भाव आये. क्यूंकि जब तक हमारे मन में अपने प्रियतम पर अधिकार की भावना रहेगी.. प्रेम में इर्ष्या और जलन का भी स्थान रहेगा.. और ये इर्ष्या और जलन ही एक दिन शक और संदेह को जन्म दे देते है. और जब ये भाव किसी रिश्ते में आ जाये तो उसका ख़तम हो जाना भी सुनिश्चित सा हो जाता है. इसलिए प्रेम में कभी अधिकार का भाव न आये. दूसरा हम सभी इन्सान है ऐसे में हममे इंसानी गुण-दोषों का होना भी लाज़मी है.. इसलिए हमें कभी ये आशा नहीं करनी चाहिए की हमारे प्रिय में सिर्फ खूबियाँ ही हो खामियां न हो.. साथ ही उसका फिजूल विश्लेषण भी न करें.. बस समर्पित कर दें अपने आप को अपने प्रिय के लिए, अपने प्रेम के लिए.. बिना किसी सोच विचार के... फिर देखिये ...
(मीरा बाई का स्केच www. barunpatro.blogpost से साभार)


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