आखिर हम लोग क्यूँ निराशा को बुरा मानते है. ये नैराश्य भी तो जीवन का अहम् अंग है. अगर इन्सान की जिंदगी में महज खुशियाँ ही तो शायद उसको इनके मायने भी मालूम न हो... पर अगर किसी इन्सान को लाख गम उठाने के बाद ख़ुशी की एक छोटी सी भी खबर सुने दे तो वो उसे सहरा में पानी की बूँद नजर आती है. ये निराशा और दुःख ही है जो हमें जीवन में पीछे मुड के देखना सिखाती है. हमें हमारी गलतियों का एहसास कराती है. जिन्दगी की भाग दौड़ में हम अक्सर अपने आप का विश्लेषण करना कहीं छोड़ देते है.. निराशा से भरा समय हमसे वो भी करवा देता है. लगभग यही वो समय होता है जब इन्सान अपने गुनाहों का प्रायश्चित करता है. यही वो समय है जब इन्सान अपनी खूबियों-खामियों को जानने की कोशिश करता है. यही वो समय होता है जब अपने पराये का भेद मालूम पड़ता है... यही वो समय है जब इन्सान अपने दुखो से लड़ना सीखता है... अपनी गलतियों से सबक लेकर फिर से उठ खड़ा होना सीखता है. इसलिए कहता हूँ की... नैराश्य भी हमारे जीवन का ही एक अहम अंग है. इससे दूर भागने की बजाय इसका सामना करना सीखे...






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