कुछ दिन बीते... अचानक घिर आए बादलो ने अचानक बरसाना भी शुरू कर दिया था. मान कर रहा था की अभी ठीक से गरमी भी नही पड़ी ओर निकम्मे आ मरे फिर से ठंड बढ़ने के लिए... जैसे ही बारिश रुकी मैं छत की और चल दिया. बारिश के बाद की ठंडक को महसूस करना भी अपने आप मे एक सुखद अहसास ही है. तभी अचानक नथुनो से एक चिर परिचित सी सुगंध आ टकराई.. आसपास कोई खेत खलिहान तो नही थे फिर भी मैं सौ फीसदी आश्वस्त था की ये खुश्बू मिट्टी की ही है. पर मान था की मानने को तैयार ही नही था की इस सीमेंट के जंगल मे भी कही सौंधी मिट्टी की खुश्बू आ सकती है. मैने माँ से पूछा शायद उनको मालूम हो.. पर जैसा अक्सर होता है वो मेरे इन अजीबो ग़रीब कौतूहलो को हमेशा हंस के टाल देती है. इस बार भी उन्होने हंस के कह दिया "लड़के तू बौरा गया है, यहाँ कहाँ मिट्टी की खुश्बू" बात तो उनकी भी सही थी. मगर उस खुश्बू का क्या करूँ जो इन सांसो मे समा गई थी. जब कुछ समझ नही आया तो फिर से छत की और दौड़ लगा दी.. खुश्बू अभी तक बरकरार थी.. और मैं उस का स्त्रोत खोज रहा था. तभी पड़ौस मे रहने वाले 10 बरस के छोटू ने पूछा "भैया क्या ढूँढ रहे हो" एक बार तो मैने सोचा की इसे कहा मालूम होगा इस खुश्बू के बारे मे, पर बार बार उसके पूछने पर मैने उसे बताया तो वो ज़ोर से हँसने लगा... भैया आप भी ना, ये देखो आप की ही छत पर गमले रखे है. उन्ही से ये खुश्बू आ रही है.
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सच में अमर बेल की तरह बढ़ते इन सीमेंट के शहरों ने हमसे कितना कुछ छीन लिया है.

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