(एक बार फिर से मुझे अपनी भावनाओं, अपने प्रेम को अभिव्यक्त करने के लिए आलोक जी के शब्दों का सहारा लेना पड़ा. दरअसल जब मैंने उनके काव्य संग्रह "वेरा! उन सपनो की कथा कहो" में लिखी उनकी इस रचना को पढ़ा तो मुझे लगा की ये सब वही है जो मैं न जाने कब से चाहता था. वही शब्द... वही भाव... बिना आलोक जी की अनुमति के उन्हें यहाँ पेश कर रहा हूँ... हालाँकि लगभग पूरी कविता ज्यों की त्यों वही है जैसी आलोक जी ने लिखी थी... बस अपने अनुसार कुछ शब्दों का मामूली सा हेर फेर किया है... बहरहाल पूरी की पूरी कविता आलोक जी की लेखनी को समर्पित.)





मैं तुम्हें प्रेम करना चाहता था
जिस तरह से तुम्हें किसी ने नहीं चाहा
तुम्हारे भाई, पिता, मां और यहाँ तक की तुम्हारा जीवनसाथी भी..
जिस तरह से तुम्हें नहीं चाह सके
मैंने चाहा था तुम्हें उस तरह से चाहना
चांद सितारों की तिरछी पड़ती रोशनी में
दपदपता हुआ तुम्हारा चेहरा
बहुत करीब से देखना....

तुम्हें छूने की इच्छा थी
तुम्हारे शरीर के हर हिस्से को
खुद में जज़्ब कर लेने की गहरी कामना भी
पर इन सब से ऊपर थी
तुम्हारे होठों की हंसी को
सदा फूलों में डूबा देखने की ख्वाहिश
सबसे परे था
बहे जा रहे समय के इस दरिया में
इत्तफाकन मिले तुम्हारे साथ को
बड़ी लौ से बचाये रखने का यत्न
देर तक तुम्हारे हांथों को
बहुत कोमलता से
अपने हांथों में सहेज रखने की भोली इच्छा

मैं चाहता था
तुम्हारा बचपन तुम्हारे कैशोर्य को खुद जीना तुम्हारे साथ
तुम्हारे अतीत की गलियों, मोहल्लों, शहरों मे जाना
जिस नदी के जिस किनारे कभी तुम ठहरी हो कुछ पल को
अपनी हथेलियों में वहां उस नदी को उठा लेना
जो फूल तुम्हें सबसे प्रिय रहे कभी
उनकी एक-एक पंखुरी को हाथ में ले कर देर तक सहलाना
जो गीत कभी तुमने गाये थे
उनके सारे बोल
सदा को इस पृथ्वी पर गुंजा देना

बहुत भोली थीं मेरी इच्छायें
उन इच्छाओं में तुम सिर्फ नारी नहीं रहीं
न कोई सिर्फ बहुत प्रिय व्यक्ति
सिर्फ साथी नहीं
फिर भला सिर्फ प्रिया
सिर्फ कामिनी ही कैसे होतीं !

तुमको इस तरह धारण किया खुद में
जैसे दरख़्त शरद की हवाओं, वन के रहस्यों और
ऋतु के फूलों को करते हैं
तुम स्वप्न नहीं थीं मेरे लिये
न सुंदर वस्तुओं की उपमा
मैंने सोचा था कि
तुममें मेरे जीवन का कोई बहुत गहरा अर्थ है

पर तुम्हारा जीवन क्या था मुझमें ?

यहीं से वह प्रश्न शुरु हुआ
जिसके फंदों में हर शब्द उलझ गया है...

मेरी भोली इच्छाओं पर
तुम्हें चाहने
और खु़द को चाह पाने का योग्य बनाने की कोशिशों पर
दुख की तेज चोटें पड़ रही हैं ....

तुम कभी जानोगी क्या कि अपने दिल की आंच में
तुम्हारे लिये बहुत करीब से मैंने क्या महसूस किया था...?

तुम यक़ीन करोगी तुम्हारे लिये
कितनी अनमोल सौगातें थीं मेरे पास....
विंध्य के पर्वत थे
सतपुड़ा के जंगल
गंगा की वर्तुल लहरें
नक्की का शीतल जल..
पलाश के इतने फूल जितनी पृथ्वी पर नदियां
तारों भरी विंध्य की रात, कास के फूल
कनेर की पत्तियां
पहाड़ी गांवों की शामें
और कुछ बहुत अकेले खंडहर
कुछ बहुत निर्जन पुल
सौंदर्य के कुछ ऐसे सघन बिंब
जिन तक काल की कोई पहुंच नहीं
और दिल के बहुत भीतर से उठी एक सच्ची तड़प...

सुनो, यह सब तुम्हारे लिये था
और यह सब आज बिलख उठा है
- ये जंगल, पर्वत, लहरें
ये फूल, नदी, शाम और खंडहर

तुम होतीं तो इन्हें एक अर्थ मिलता
इनका एकांत यों भी होता
जैसे आकाशगंगाओं में तारों की हंसी गूंजे
इन्हें सिर्फ प्यार नहीं एक संबंध चाहिये था
एक संबोधन चाहिये था ...
एक स्पर्श और एक हंसी चाहिये थी
अफसोस ! ऐसा कुछ न हुआ
और इन सब में गहरे उतर गये हैं
दुख के मौसम और उदासी के बोल ....

तुम्हारे इसी नगर में मैं
इस सब के साथ थके कदमों से गुजरता हूँ
कभी तुम्हारे घर के सामने से भी
कभी बहुत दूर उन रास्तों से
उन लोगों से, उन इमारतों और उन दरख़्तों से
जो तुमसे आश्ना थे
पर यह दर्द है कि बढ़ता ही जाता है
गो कि कभी कभी लगता है कोई रंजो-ग़म नहीं
फ़क़त उदासियां हैं शाम की ....
और मैं....
मैं आज भी तुम्हे प्रेम करना चाहता हूँ...
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पिछले दिनों चर्चित पाकिस्तानी फिल्म "बोल" देखी. हालाँकि जिन लोगो ने इन्ही निर्देशक महोदय की "खुदा के लिए" देखी होगी उन्हें ये फिल्म थोड़ी कमतर लगी होगी, मगर फिर भी अपने तमाम झोलों के बावजूद पाकिस्तान के माहौल को देखते हुए इतनी यथार्थ परक फिल्म बनाने के लिए निर्माता-निर्देशक को कोटिश: साधुवाद. 
दरअसल फिल्म की शुरुआत की बड़ी दमदार है. चंद घंटो बाद फांसी के फंदे पर झूलने वाली लड़की का मीडिया के सामने अपनी कहानी बयां करना, पलकों के कोरों को भीगने के लिए काफी था. उसके बाद जैसे जैसे फिल्म बढती गयी एक के बाद एक नायिका के जख्म उघड़ने लगे. मुस्लिम परिदृश्य में लिखी इस कहानी में लगभग हर दूसरी महिला की कहानी नजर आती है, भले देश कोई हो हमारे यहाँ औरतों की कमोबेश यही स्थिति नज़र आती है. उन्हें या तो महज बच्चे पैदा करने की मशीन समझ लिया जाता है या हुकुम की तामिल करने वाली बांदी. फिल्म में कुछ पात्र बड़ी ही शिद्दत के साथ लिखे गए है.. मसलन हर बात को तार्किक रूप से सोचने और उस पर अडिग कड़ी नायिका हो या सब कुछ जानबूझ कर चुपचाप सहन करती उनकी लाचार मां... पिता से छुप कर आकाश में उड़ने के ख्वाब बुनती नायिका की बहन. या उन सब से अलग थलग अपने नपुंसक होने का दंश झेलता सैफू. और उन सब पर भारी बात बात पर अपनी खीज मिटने को घर की औरतो पे हाथ उठता नायिका का पिता. सभी किरदार कहानी को आगे बढ़ाने में अपना सहयोग करते है. फिल्म की कहानी तो मन को झकझोरने वाली है ही..   संवाद उससे भी जानदार.. मसलन ...
नायिका का ये कहना की "हर बरस हमारे घर दाई आने लगी". या "मर्द हो, इसलिए जब लाजवाब हो गए तो हाथ उठा दिया." इसी तरह जब सैफू मर्द होने के गुण बताता है तो कहता की  "मर्द बनने के करना ही क्या होता है.. थोडा माथे पर त्योरियां चढ़ा लो, आवाज को भारी बना लो, बदजबान बनो... और घर की औरतो को दो-चार हाथ जमा दो."
बहरहाल अपनी हर बेवकूफी के लिए खुदा/भगवान को जिम्मेवार ठहराने वालो... सहित आप और हम जैसे आम आदमियों को भी सोचने पर मजबूर करती है की... सिर्फ मारना ही जुर्म क्यूँ है.. पैदा करना क्यूँ नहीं?

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कैसा लगा.. 
काफी अरसा हो गया इस वाकये को पर आज न जाने क्यूँ फिर से याद आ रहा है. मेरे घर से लगता हमारे पडोसी का घर है. उन्होंने एक चिड़िया पाल रखी  है. पाल क्या रखी है, बस वो दिनभर उन्ही के आंगन में फुदकती रहती है. मैं अक्सर उसको निहारता रहता. बड़ी प्यारी चिड़िया थी... एकदम सुनहरी सा रंग..  और पडोसी ने उसके पैरो में एक छोटा सा घुंघरू भी बांध रखा था, जिससे वो जब भी यहाँ से वहां घुमती तो घर में घुंघुरू की बड़ी ही प्यारी सी आवाज भी उसके साथ चलती.
मैं जब भी उसको देखता मेरा बहुत मन होता की काश वो चिड़िया एक बार ही सही मेरे घर के आंगन में भी उतरे, अरसे के इंतजार के बाद एक दिन वो सुनहरी चिड़िया पडोसी के छज्जे से उतर कर मेरे आंगन में आ पहुंची... उसे यूँ अचानक आया देख मुझे विश्वास नहीं हुआ की जिसे रोज दूर से देखता था आज वो मेरे इतना करीब है.. की मैं उसे छू सकता हूँ.. उसको महसूस कर सकता हूँ.. बहरहाल मैंने उसको अपने हाथो से चुग्गा खिलाया.. वो उचल कर मेरे हाथ पर बैठ गई और मैं उसे देर तक सहलाता रहा.. 
उसके बाद तो ये लगभग रोज़ का ही सिलसिला हो गया. उसका सवेरे सवेरे आना और देर तक हम दोनों का साथ बैठना.. मुझे लगाने लगा था की अब वो पडोसी के घर की चिड़िया नहीं बल्कि मेरे घर की ही सदस्य है. एक खास किस्म का लगाव भी हो गया था उससे. फिर अचानक से न जाने क्यूँ उसका हमारे घर आना बंद हो गया.. देखा फिर से वो वहीँ पडोसी के आंगन में फुदकती घूम रही है.. अपने पैरो से घुंघरुओं की आवाज करते हुए.. बहुत इंतजार किया उसका की वो फिर से मेरे आंगन में भी उतरे.. पर शायद ये होना फिर से मुमकिन नहीं था.. अब भी देखता हूँ उस चिड़िया को पडोसी के आंगन में फुदकते हुए.. तो दिल को सुकून सा मिलता है.. की चलो  मैं उसको यूँ ख़ुशी से फुदकते हुए तो देख सकूँगा. ... भले इस आंगन न सही.. उस आंगन ही सही. 


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मैं हमेशा से इस बात पर अडिग था की रिश्तों में कभी झूठ नहीं होना चाहिए. और था क्या आज भी अडिग ही हूँ. पर अपने पिछले कुछ अनुभवों से मैंने ये जाना की हमेशा सच को जानना इतना भी जरुरी नहीं होता है. दरअसल कई दफा सच का स्वरूप इतना उलझा और विकृत हो जाता है की लाख कोशिशों के बाद भी वो समझ नहीं आता. ऐसे में उसका सामने न आना ही श्रेयस्कर होता है. और फिर रिश्ते तो हमेशा से ही केवल और केवल विश्वास की बुनियाद पर टिके होते है.. ऐसे में उन्हें सच की बैसाखियों की शायद जरुरत नहीं होती. इसके अलावा एक बात और भी है यदि रिश्तों में कोई बात हमारे साथी द्वारा छिपी भी गयी है तो ये भी जरुर है की शायद उस सच के सामने आने पर रिश्ते को खो देने का डर उन्हें भी रहा होगा. ऐसे में फिजूल केवल इसलिए की हमें सच जानना ही है.. हम उस की जड़ तक जाने की कोशिश करे... मेरे ख्याल में ये बेमानी होगा. क्यूंकि सच को जानने की जो प्रक्रिया है वो बड़ी तकलीफदेह है. कई मर्तबा ये शरीर से मवाद रिसने जैसा हो जाता है. और फिर अगर इन सबसे गुजर कर सच हासिल भी कर लिया तो उसका क्या फायदा? क्यूँ इससे न केवल हम अपने साथी का विश्वास खो देते है... बल्कि उसपर से हमारा विश्वास भी चकनाचूर हो जाता है. और फिर ये सच सिर्फ रिश्तो को तोड़ने के लिए कुछ बेवकूफाना आधार देने के सिवा और किसी काम का नहीं रह जाता है. ऐसे में शायद अपनी प्राथमिकताये हमें खुद ही तय करनी चाहिए की हमारे लिए सच ज्यादा मायने रखता है या रिश्ते....
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कैसा लगा.. 
सीखा भरोसा तुझी से, ओर निभाना इश्क़ भी सिखाया तुम्ही ने,
भले ना खाई हो कभी कसमे तूने, पर कसम निभाना भी सिखाया तुम्ही ने,

ना मिल सकोगी कभी ये एहसास भी कराया तुम्ही ने,
ओर जुदा ना रह सकोगी, ये जताया भी तुम्ही ने,

ना इकरार ही करे हो, ना इनकार की किया तुम्ही ने
हर बात कहना ज़रूरी तो नही, ओर कह भी दीया तुम्ही ने

सफाई देना ना कभी गवारा था तुम्हे
आज हर बात की सफाई भी दे दी तुम्ही ने

एक मेरे खोने के डर से, क्या क्या ना किया तुमने
एक मैं जो हर बार बस खता पे खता ही किए हूँ..
.
था मैं खुद से ही शर्मिंदा, था दामन भी मेरा दागदार
बस था तो तेरे इश्क़ का इल्म ओर रूह का तेरी साथ.



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आलोक जी की एक रचना है एक दिन आयेगा... जिसमें उन्होने जीवन में किसी के आगमन पर होने वाले संभावित बदलावों, उन खुषनुमा अहसासों का बडा ही खूबसूरती के साथ चित्रण किया है। आलोकजी की पुस्तक वेरा.... उन सपनों की कथा कहो ! में प्रकाषित ये काव्य पाठ हमेषा से ही मेरे दिल के करीब रहा है। हांलाकि उनके लिखे का मैं प्रत्युत्तर दूं... ऐसी धृष्टता करने के बारे में मैं कभी सोच भी नहीं सकता... ये मेरा एक विनम्र प्रयास है, आलोकजी की लेखनी को प्रणाम करने का....




और जब तुम चली गई...
एक दिन वो भी आया जब तुम चली गई
जिन रास्तों से तुम गुजरी थी
अब वहां छाया है घनघोर बियाबान

जिन झरनों की छुआ था तुमने
खारा हो चुका है उनका सारा पानी
जिन दरवाजों पर हुई थी कभी
तुम्हारे हाथों की थपथपाहट
छायी है वहां आज मरघट सी वीरानियां

जिस शख्स को अपना मान की थी तुमने पहरों पहर बाते
उसके सीने में सुलगता है नफरतों का ज्वालामुखी
जिस कांधे को छुआ था तुमने
वो अब नहीं उठा पाता है खुद अपना बोझ भी
जिन आंखें में झांका था तुमने कभी
उन आंखों में अब बस पतझड सा सूनापन है

जिस व्यक्ति को तुमने प्यार किया
चाहा था जिसकों दिल की तमाम गहराईयों से
आज नरक सा हो चला है उसका सारा जीवन

चैत्र गुजरा भी नहीं
और पत्रहीन हो गए इन पलाश-वृक्षों पर
जैसे रंग उतरता है
ऋतु भीगती है भोर की ओस में
वैसे ही गुजर गई तुम एक दिन हमारी इच्छाओं, दुखों और स्वप्नों के बीच से

और....... आज मैं दुखी नहीं हूं तुम्हे लेकर
ना तुम्हे दोष दूंगा, ना ही कोई उम्मीद पाली है
पर, सचमुच आज भी तुम्हे चाहता हूं
और शायद तुम भी महसूस कर पा रही हो
मेरे प्यार का ताप

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मेरी ये ज़िंदगानी अधूरी सी है तुम्हारे बिना,
इसे पूरा कर दो... बस ये एहसान कर दो..
तुम्हारे आने भर से ये दरो दीवार घर बन जाएँगे..
तुम्हारे आने से ये अधूरापन पूरा हो जाएगा
यहाँ तुम पर शक करके कोई तुम्हे छोटा नही बनाएगा,
...ना यहाँ तुमसे कोई सवाल होंगे, ना ही उनके जवाब माँगे जाएँगे,
फिर ये ज़िंदगी यूँ ही गुजर जाएगी तमाम मुश्किले बस आसां होगी..
ये सब मुमकिन होगा.... बस तुम एक बार हाँ कह दो...
मेरी ज़िंदगानी अधूरी ही है... इसे पूरा कर दो...



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