बस चंद दिन और... 
फिर तुम नहीं होंगी
यूँ इस तरह मेरे साथ
जिस तरह होती हो इन दिनों
ना होंगी तुम्हारी हिदायते
ना होगी कोई शिकायते
सोच कर भी घबरा जाता हूँ मैं
फिर कोई नहीं होगा
यूँ हर बार मुझे समझाने वाला
इस बार बिखरने से पहले 
हज़ार बार सोचना होगा मुझको
अब नहीं होगा कोई मुझे संभालने वाला
ऐसा नहीं की इन सब खयालो से
बावस्ता नहीं था मेरा वजूद
मगर इन सब से परे कुछ और भी था
जो था इन सब से ज्यादा अहम.. 
इन सबसे जरुरी
और वो थे तुम्हारे लिए मेरे एहसास
तुम्हारा मान, तुम्हारा सम्मान
जो न जाने क्यूँ दबता जा रहा था
इन खोखले आदर्शो, उसूलों के बोझ तले
और बहुत जरुरी हो चला था
तुम्हे इन सब से आजाद कर देना
जानता हूँ बहुत कोशिशो के बाद संभल पाया था
ये रिश्ता हमारे तुम्हारे दरमियाँ
मगर इससे भी ज्यादा जरुरी थे
मेरी नज़र में... कुछ और रिश्ते..
वो जिनके लिए तुम्हारा होना
उतना ही जरुरी था
जितना की तुम्हारा होना
ऐसा नहीं की अब तुम नहीं रहोगी मेरे साथ
तुम हरदम यही होंगी..
मेरी हर बकवास.. मेरी हर झल्लाहट के साथ
तुम यही रहोगी..
और हमारे हर काम में.. फिर जब हर गलती पर
तुम्हारे  न होने का एहसास भारी हो जायेगा
तब.. जो सुकून मिलेगा मुझे
वो दूर कर देगा
तेरे यहाँ न होने के एहसास को
बस यही दुआ है अब खुदा से
की ए दोस्त अब जहा भी है तू
अब खुश रहना..
और जैसे हो बस.. बने रहना..
मेरे साथ.. 


बीत चूका है वो समय

जब तुम और सुख
आते थे साथ साथ..
एक दूसरे की
गल बहियाँ  डाले..

जब खुशियाँ
ढूंढा करती थी
बहाने तेरे होने के--

अब तो लगता है

दुःख में और
तुममे कोई रिश्ता है..
जब भी ये होता है
तुम भी होती हो
यहीं कहीं
आस पास..

मेरी यादों में




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लेखक - किधोर चौधरी
पिछले दिनों कुछ एसा गठित हुआ जो हिन्दी साहित्य में एक अनूठा इतिहास रच गया। ऐसे दौर में जब हर कोई किताबो और उनको पढने वालों को बीते जमाने का बताने से नहीं चूक रहा था ठीक उसी समय एक नए परन्तु अनजाने नहीं ब्लॉगर की पहली किताब आने की घोषणा होती है और मानो समूचे साहित्य जगत में एक जलजला आ जाता है। ऑल इंडिया रेडियो के इस मुलाजिम को उनके ब्लॉग या फेसबुक के माध्यम से जानने वालो की संख्या तो खासी है परन्तु इन माध्यमों से दूर रहने वाले लोगो के लिए ये नाम उतना ही अनजाना या नया है जितना कि मेरा या किसी भी दूसरे इन्सान का नाम। ऐसे में किशोर चौधरी की किताब को वेब बुक स्टोर इंफीबीम ने प्री-लांच बुकिंग के लिए रखा तब तमाम अंग्रेजी किताबो की सूची में इनका कहानी संग्रह चौराहे पर सीढियां अकेली हिन्दी की पुस्तक थी। साईट पर आने के महज चार से पांच दिनों की भीतर ये दूसरे स्थान पर जा पहुंची इतना ही नहीं प्री-बुक्रिग के मामले में इस किताब ने ना जाने ख्यात हिन्दी अंग्रेजी किताबो को पीछे छोड दिया है।वर्तमान में किताब इंफीबीम और फ्लिपकार्ट दोनो वेब स्टोर पर धडल्ले से बिक रही है।
इस किताब ने दो मिथक तोडे है, पहला ब्लॉग लिखने वाले गंभीर लेखक नहीं हो सकते या ब्लॉग पर केवल कूडा करकट मिलता है। दूसरा, अभी भी हिन्दी पढने वालों की तादाद में कोई कमी नहीं हुई है बल्कि फेसबुक सरीखे सोशल मीडिया के नए ठिकानों ने दनकी संख्या में आशातीत बढोतरी की है। जिन लोगो ने किशोर चौधरी की इस पुस्तक को पढा है या उनके ब्लॉग को पढा वे संभवतया मेरी इस बात से पूर्णतया सहमत होंगे कि किशोर का लिखा सीधा दिल को छूता है। कोई लाग लपेट नहीं कोई साहित्यिक गुलाटियां नहीं, मुझे याद आता है अपने एक इंटरव्यू में फिराक साहब ने कहा था कि बेहतर साहित्य हमेशा सब्जी वालों की भाषा में लिखा जाता है, एकदम सीधा और सरल। हालांकि किशोर का लिखा इतना भ्ज्ञी सीधा और सरल नहीं है परन्तु उसके भाव समझने के लिए आपको ज्यादा माथापच्च्ी नहीं करनी पडती। बहरहाल किताब में शामिल एक एक कहानी रिश्तो के नए मायने, स्त्री-पुरूष संबंधो की विवेचना करती नजर आती है।
हिन्दी और हिन्दी की ताकत को फिर से साबित करने और स्थापित करने के लिए किशोर चौधरी और प्रकाशक हिन्द युग्म को साधुवाद!!!

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सोचा था की हर लम्हा जिन्दगी का गुजरेगा तेरे ही संग
अब तेरे बिना जीना गर जिंदगी है तो हाँ जिंदा हूँ मैं...


कभी सोचा भी न था की जीना पड़ेगा बिन तेरे
अब तुझ बिन जीने की सोचना गर जिंदगी है तो हाँ जिंदा हूँ मैं...


गर सिर्फ सांसों का चलना भर जिंदगी है...
तो हाँ.. जिंदा हूँ मैं....




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धरती पर चार दीवारे खड़ी कर देने भर से जो बना था उसी को वो घर कहता था. और रात को सोते समय उसके और चाँद तारो के बीच में जो टूटी खपरैल आती थी उसे छत. इसी छत में बने एक सुराख़ से छन कर आने वाले धूप के चंद टुकडो से खेलते उसका दिन बितता था. घर में जैसे जैसे धूप सरकती वो इधर से उधर सरकता जाता. शरीर बनाते समय विधाता ने थोड़ी कंजूसी बरती थी लिहाज़ा उसके पैर उसके शरीर का बोझ उठा पाने के काबिल नही थे. बाहर निकलेगा तो गिर पड़ेगा इसी डर से माँ-बाप ने कभी बाहर की दुनिया देखने ही नही दी. जिस घर में खाने के भी फांके हो उस घर में धूप के चंद टुकड़े ही उसके खेलने का जरिया थे.

माँ उसको खेलते देखती और बेबसी में बस मुस्कुरा देती. वो हमेशा कहता देखना एक दिन इस पुरे घर में धूप भर जायेगी और हम खूब खेलेंगे. 
एक रात जोर का तूफान आया और उस रात ना उस घर की छत बची ना दीवारे...


अगली सुबह बच्चा उठा.. जहाँ तक उसकी नज़र गयी... धूप ही धूप थी... बस धूप


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क्यूँ घर भर का काज करे है वो

क्यूँ दुनिया भर से लाज करे है वो

क्यूँ खेल सके ना मन से वो,

क्यूँ सहन करे है सब कुछ वो


है वो भी भैया जैसी ही 

पर भैया सा प्यार नहीं मिलता

है इंसा वो भी उस जैसे ही

पर इंसा सा मान नहीं मिलता





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देश के हर दूसरे गांव जैसा ही एक गांव ये भी था. नाम रहने भी दे तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है. इसी गांव में दो लोग थे. दोनों के मजहब अलग दोनों के परिवार अलग.. फिर भी दोनों एक दूसरे से प्रेम करते थे. सयाने कहते थे की ये प्रेम नही केवल उम्र का तकाज़ा है पर उन दोनों का मानना था की उन्हें प्रेम है. सो उसी प्रेम की गिरफ्त में एक दिन दोनों ने सोचा की वो एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते लिहाज़ा उन्हें शादी कर लेनी चाहिए 
"मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता" - लड़के ने कहा, "अब हमें जल्द ही शादी कर लेनी चाहिए."
"वो तो ठीक है पर तुम्हे हमारा धर्म कबूल करना पड़ेगा वरना अब्बा नहीं मानेंगे" - लड़की ने भी मजूरी जताई.
"मैं क्यूँ अपना धर्म बदलू तुम क्यों नहीं मेरा धर्म स्वीकार कर लेती हो, दोनों चैन से जियेंगे... वैसे भी शादी के बाद तुम्हे कोनसा अपने अब्बा के घर जाना है." - लड़के ने तर्क दिया.
"नही ऐसा नहीं हो सकता, अगर तुम मुझसे प्यार करते हो और शादी करना चाहते हो तो तुम्हे मेरा धर्म अपनाना ही पड़ेगा" - लड़की ने अंतिम हथियार फेंका.
"अगर ऐसा है तो ठीक है तुम मुझे भूल जाना, मैं अपना धर्मं नहीं बदलूँगा" और लड़का बिना मुड़े चला गया.. लड़की भी बिना पलटे वहां से चली गई...

एक बार फिर जात-धर्म जीत गए.. और प्यार हार गया.


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सच कितना मजबूर है मेरा प्रेम...
और उतनी ही निष्ठुर तुम
जितना मुझसे ये करीब होता जाता है
तुम मुझसे उतनी ही दूर चली जाती हो

....और मेरे पास रह जाते है
फकत तेरी यादों के साये..
चंद अल्फाज़.. और आँखों में ये नमी






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जानता था कभी मूर्त रूप ले ही नहीं पाएगा हमारा प्रेम

हालाँकि मैंने तुमसे ही जानी थी छुअन प्यार की

गाहे बेगाहे यूँ ही छू लिया करता था तुम्हे

मेरी सांसो में अब भी बसी है तुम्हारे बदन की खुशबू



अपने तमाम समर्पण के बावजूद जानता था

कभी तुम पर कोई हक नहीं जाता पाउँगा

क्यूँ की ये हक ना जाने क्यूँ

तुमने अनायास ही दे दिया था किसी और को



हालाँकि प्रेम का उन्माद तुम पर भी तारी था

मगर हमारा ये सभ्य और सुसंस्कृत समाज

किसी इंसान को दो बार प्रेम करने की इजाजत नही देता

और गलती से वो इंसान "स्त्री" हो


.....तो कतई नहीं.... हरगिज़ नहीं


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दुनिया की हर कहानी की तरह ही होगा
इस कहानी का भी
प्रारंभ और अंत
बिलकुल सामान्य; संभवतया कुछ उजला कुछ स्याह
परन्तु जो रहेगा सर्वाधिक रोचक और ज्वारीय
वो यही होगा.... यही यानि ये "बीच का हिस्सा"

इस कहानी का प्रारंभ तुमने रचा
अपनी ही तरह अल्हड, उन्मुक्त और निश्छल
और अंत रचा तुम्हारे अपनों ने .... तुम्हारे लिए
उदास, षड्यंत्रों और तमाम बंदिशों से युक्त
पर अपनी मरजी और इच्छाओ से
हमने मिलकर जो जिया
वो यही था..... यही यानि ये "बीच का हिस्सा" 

किसी उन्मुक्त नदी की मानिंद
प्रारंभ से ही रही तुम वेगवती
और किसी समंदर में मिल कर पाओगी
निज पूर्णता को तुम
पर सहस्त्रो लोगो और खुद तुम्हे
शांति और जीने का मकसद देगा
यही .... बस यही यानि ये "बीच का हिस्सा"

मुझे याद नहीं है लेश मात्र भी कुछ
ना अपना प्रारंभ ना अंत
सतत प्रयासों से भूल पाया हूँ मैं
ये व्यर्थ सा सब कुछ
बस रहा जो शेष स्मृतियों में मेरे
वो यही है .... यही यानि ये "बीच का हिस्सा" 



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(तकनीक अपने साथ कुछ नया तो लाती ही है पर वो अपने साथ पुराने को बिरसा भी देती है, टेबलेट, कंप्यूटर और ना जाने क्या क्या... एक छोटे से डिब्बे मे संसार समा लेने का दम भरते लोग... पर एक बात अक्सर भूल जाते है की जो सुख काग़ज़ पे छपे को आँखो से महसूस करके दिल-दिमाग़ में बैठा लेने का सुख है वो इन 7-8 इंच की हाई टेक स्क्रीन में देखने में नही है.... एक ऐसी ही खूबसूरत तुलना राजेश जी ने इस कविता में की है)







टेबलेट में स्क्रीन को टच
करके उन्हे पढ़ते देखा
चौखने में सारा
संसार टटोलते देखा
लेकिन!!!!
पढ़ने का मज़ा तो किताब में हैं
ये वो ही ले पाते हैं, जो
टच और स्पर्श का अंतर
जानते हैं....
किताबो की दुनिया निराली है
पन्नों को मोड़ना और
उलटना-पलटना
काग़ज़ की खुरदारहट या
चिकनेपन को शब्दों के साथ
महसुसना
नई किताब की खुश्बू को सूंघना
चेहरे पे किताब रखाके सपने देखना
तकिये के पास किताब को रखना और सो जाना
प्रिय पंक्तियों के नीचे पेंसिल से
पटरी बिछाना
एक साथ पतली किताब पी जाना
या फिर मोटी सी पोती को
महीनों तक दवा की तरह गुटाकते रहना
या बीच में छोड़ देना
किताब में काग़ज़ की पर्चिया डालना
रंगीन कवर को निहारना
और पहले पन्ने पर नाम और तारीख लिखना
भेंट में किताब देना या लेना
बहुत सुकून देता हैं
किताबो की दुनिया का मज़ा ही
कुछ और है
ये वो लोग ही ले पाते है, जो
टच और स्पर्श का अंतर जानते है

(ये कविता राजेश जी ने फलोदी से जयपुर के रास्ते में लिखी)
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