देश के हर दूसरे गांव जैसा ही एक गांव ये भी था. नाम रहने भी दे तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है. इसी गांव में दो लोग थे. दोनों के मजहब अलग दोनों के परिवार अलग.. फिर भी दोनों एक दूसरे से प्रेम करते थे. सयाने कहते थे की ये प्रेम नही केवल उम्र का तकाज़ा है पर उन दोनों का मानना था की उन्हें प्रेम है. सो उसी प्रेम की गिरफ्त में एक दिन दोनों ने सोचा की वो एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते लिहाज़ा उन्हें शादी कर लेनी चाहिए 
"मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता" - लड़के ने कहा, "अब हमें जल्द ही शादी कर लेनी चाहिए."
"वो तो ठीक है पर तुम्हे हमारा धर्म कबूल करना पड़ेगा वरना अब्बा नहीं मानेंगे" - लड़की ने भी मजूरी जताई.
"मैं क्यूँ अपना धर्म बदलू तुम क्यों नहीं मेरा धर्म स्वीकार कर लेती हो, दोनों चैन से जियेंगे... वैसे भी शादी के बाद तुम्हे कोनसा अपने अब्बा के घर जाना है." - लड़के ने तर्क दिया.
"नही ऐसा नहीं हो सकता, अगर तुम मुझसे प्यार करते हो और शादी करना चाहते हो तो तुम्हे मेरा धर्म अपनाना ही पड़ेगा" - लड़की ने अंतिम हथियार फेंका.
"अगर ऐसा है तो ठीक है तुम मुझे भूल जाना, मैं अपना धर्मं नहीं बदलूँगा" और लड़का बिना मुड़े चला गया.. लड़की भी बिना पलटे वहां से चली गई...

एक बार फिर जात-धर्म जीत गए.. और प्यार हार गया.


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