एक बेटी के पढने से दो घरों में उजाला फैलता है... हम हर हाल में अपनी बेटियों को पढाना ही चाहिए। स्टेज से मंत्रीजी का जोशीला भाषण सुनकर जनता धन्य हो रही थी। स्टेज के नीचे बैठे लोग फुसफुसा रहे थे... हमारे मंत्रीजी कितने अच्छे है.. लडके लडकियों में बिलकुल भी फर्क नहीं करते है।
भाषण के बाद सरकारी स्कूल की लडकियों की स्कूल ड्रेस और किताबों के लिए पचास हजार रूपये की राशि दान देकर जैसे ही मंत्रीजी घर लौटे। पत्नी ने उनके सामने बेटी का एडमिशन फॉर्म रख दिया... कहा... आज आखिरी तारीख है दाखिले की... आप इस पर साईन कर दिजिए... नहीं तो बेटी का एमबीए रह जाएगा...
अरे तो उसे एमबीए करके कौनसा तीर मारना है... आखिर जाएगी तो तो पराए घर ही ना...
और तू भी बात बात मै उसकी पक्ष लेकर उसे सर पर चढाना छोड दे... वरना एक हाथ पडा नहीं कि सारा दिमाग ठिकाने लग जाएगा...
मंत्रीजी का पारा सातवें आसमान पर चढ चुका था।... अपने कमरे मै जाते जाते फरमान सुना गए.. मै कमरे में जा रहा हूं, खाना वहीं भिजवा देना... और हां, मेरा सामान पैक कर देना... दो दिन के लिए दिल्ली जाना है...
और थोडी देर बात मंत्रीजी खाना खाकर सो गए... आखिर उन्हे अगले दिन दिल्ली में बालिका शिक्षा को बढावा देने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा स्वतन्त्रता दिवस पर प्रधानमंत्री द्वारा सम्मानित जो किया जाना था।
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