मैं हमेशा से इस बात पर अडिग था की रिश्तों में कभी झूठ नहीं होना चाहिए. और था क्या आज भी अडिग ही हूँ. पर अपने पिछले कुछ अनुभवों से मैंने ये जाना की हमेशा सच को जानना इतना भी जरुरी नहीं होता है. दरअसल कई दफा सच का स्वरूप इतना उलझा और विकृत हो जाता है की लाख कोशिशों के बाद भी वो समझ नहीं आता. ऐसे में उसका सामने न आना ही श्रेयस्कर होता है. और फिर रिश्ते तो हमेशा से ही केवल और केवल विश्वास की बुनियाद पर टिके होते है.. ऐसे में उन्हें सच की बैसाखियों की शायद जरुरत नहीं होती. इसके अलावा एक बात और भी है यदि रिश्तों में कोई बात हमारे साथी द्वारा छिपी भी गयी है तो ये भी जरुर है की शायद उस सच के सामने आने पर रिश्ते को खो देने का डर उन्हें भी रहा होगा. ऐसे में फिजूल केवल इसलिए की हमें सच जानना ही है.. हम उस की जड़ तक जाने की कोशिश करे... मेरे ख्याल में ये बेमानी होगा. क्यूंकि सच को जानने की जो प्रक्रिया है वो बड़ी तकलीफदेह है. कई मर्तबा ये शरीर से मवाद रिसने जैसा हो जाता है. और फिर अगर इन सबसे गुजर कर सच हासिल भी कर लिया तो उसका क्या फायदा? क्यूँ इससे न केवल हम अपने साथी का विश्वास खो देते है... बल्कि उसपर से हमारा विश्वास भी चकनाचूर हो जाता है. और फिर ये सच सिर्फ रिश्तो को तोड़ने के लिए कुछ बेवकूफाना आधार देने के सिवा और किसी काम का नहीं रह जाता है. ऐसे में शायद अपनी प्राथमिकताये हमें खुद ही तय करनी चाहिए की हमारे लिए सच ज्यादा मायने रखता है या रिश्ते....
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