आलोक जी की एक रचना है एक दिन आयेगा... जिसमें उन्होने जीवन में किसी के आगमन पर होने वाले संभावित बदलावों, उन खुषनुमा अहसासों का बडा ही खूबसूरती के साथ चित्रण किया है। आलोकजी की पुस्तक वेरा.... उन सपनों की कथा कहो ! में प्रकाषित ये काव्य पाठ हमेषा से ही मेरे दिल के करीब रहा है। हांलाकि उनके लिखे का मैं प्रत्युत्तर दूं... ऐसी धृष्टता करने के बारे में मैं कभी सोच भी नहीं सकता... ये मेरा एक विनम्र प्रयास है, आलोकजी की लेखनी को प्रणाम करने का....




और जब तुम चली गई...
एक दिन वो भी आया जब तुम चली गई
जिन रास्तों से तुम गुजरी थी
अब वहां छाया है घनघोर बियाबान

जिन झरनों की छुआ था तुमने
खारा हो चुका है उनका सारा पानी
जिन दरवाजों पर हुई थी कभी
तुम्हारे हाथों की थपथपाहट
छायी है वहां आज मरघट सी वीरानियां

जिस शख्स को अपना मान की थी तुमने पहरों पहर बाते
उसके सीने में सुलगता है नफरतों का ज्वालामुखी
जिस कांधे को छुआ था तुमने
वो अब नहीं उठा पाता है खुद अपना बोझ भी
जिन आंखें में झांका था तुमने कभी
उन आंखों में अब बस पतझड सा सूनापन है

जिस व्यक्ति को तुमने प्यार किया
चाहा था जिसकों दिल की तमाम गहराईयों से
आज नरक सा हो चला है उसका सारा जीवन

चैत्र गुजरा भी नहीं
और पत्रहीन हो गए इन पलाश-वृक्षों पर
जैसे रंग उतरता है
ऋतु भीगती है भोर की ओस में
वैसे ही गुजर गई तुम एक दिन हमारी इच्छाओं, दुखों और स्वप्नों के बीच से

और....... आज मैं दुखी नहीं हूं तुम्हे लेकर
ना तुम्हे दोष दूंगा, ना ही कोई उम्मीद पाली है
पर, सचमुच आज भी तुम्हे चाहता हूं
और शायद तुम भी महसूस कर पा रही हो
मेरे प्यार का ताप

शीर्षक ,
कैसा लगा.. 
2 Responses
  1. Anonymous Says:

    jo likha hai wo bahut strong hai
    ekdum teer jaisa


  2. Anonymous Says:

    शानदार...


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