कमल किशोर जैन
(हालाँकि मैं नेरूदा नही.. और मैने उन्हे ज़्यादा पढ़ा भी नही.. पर ये कविता मेरे किसी अपने को बहुत पसंद है.. ओर उसी ने सबसे पहले मेरा परिचय नेरूदा से करवाया.. पता नही क्यूँ आज जब इस कविता को पढ़ने बैठा तो लगा की इसका एक एक शब्द मेरे मनोभाव को व्यक्त कर रहा है... अत: ये अनुवाद उस खास इंसान को समर्पित)

शायद आज रात मैं लिख पाऊंगा अपनी सबसे उदास कविता

इतनी कि जैसे ये रात है सितारों भरी
और नीले तारे सिहरते हैं दूर कहीं बहुत दूर
रात की हवाएं इस अनंत आकाश मे गाते हुए यूँ ही बेसबब डोलती हैं

आज रात लिख पाऊंगा अपनी सबसे उदास कविता
क्योंकि मैंने उसे चाहा, ओर थोड़ा उसने मुझे
इस रात की तरह थामे रहा उसे बाहों में
इस अनंत आकाश तले चूमा था उसे
क्योंकि उसने मुझे चाहा, थोड़ा  मैंने उसे
उसकी बड़ी ठहरी आँखों से भला कौन न करेगा प्यार
आज रात  लिख पाऊंगा सबसे उदास कविता अपनी
ये सोच कर कि अब वह मेरी नहीं. इस अहसास से कि मैंने उसे खो दिया

रातों को सुनकर, और-और उसके बिना पसरती रात
चारागाह पर गिरती ओस के मानिंद उसके छंद गिरते है आत्मा में
क्या फर्क पड़ता है यदि मेरा प्रेम उसे संजो न सका
रात तारों भरी है और वह मेरे संग नहीं
बस ये सब है. दूर कोई गाता है बहुत दूर

उसे खोकर मेरी आत्मा व्याकुल है
निगाहें मेरी खोजती हैं उसे, जैसे खींच उसे लायेंगी करीब

दिल मेरा तलाशता है, पर वह मेरे साथ नहीं.

वही रात, वही पेड़, उजला करती थी जिन्हें
पर हम, समय से .. कहाँ रहे वैसे

ये तय है अब और नहीं करूँगा उससे प्यार, पर मैंने उससे कितना किया प्यार
मेरी आवाज़ आतुर ढूंढ़ती है हवाएं जो छू सकें उसकी आवाज़
होगी, होगी  किसी और की जैसे वह मेरे चूमने के पहले थी


उसकी आवाज़,  दूधिया देह और आँखें निस्सीम
ये तय है अब और नहीं करूँगा उससे प्यार, या शायद करता रहूँ प्यार


कितना संक्षिप्त है ये हमारा प्यार.. और भूलने का अरसा कितना लंबा
ऐसी ही रात में मैं थामे था उसे अपनी बाहों में


मेरा मान शांत नही है उसे खोकर
शायद यह अंतिम पीड़ा है जो उसने दी है मुझे

और ये अंतिम कविता जो मैं लिखूंगा
उसके लिए .सिर्फ़ उसी के लिए


कमल किशोर जैन

हिंदी कविता संसार की दुनिया में शायद दुष्यंत कुमार के बाद सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले  कवी अदम गोंडवी जी की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना. भले सरकारे कितने दावे कर ले... भले लोग समानता की कितनी ही बाते कर ले... जब जब गोंडवी जी की ये रचना पढ़ता हूँ... लगता है आज भी यही हकीकत है हमारे गाँवो की... आज भी यही मानसिकता है हमारे समाज की... पेश है  राम नाथ सिंह ' अदम गोंडवी ' की ये रचना .....

आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी कि कुएँ में डूब कर

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा

कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई

कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है

थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को

डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से

आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में

होनी से बेखबर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी

चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई

दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया

और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज़ में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में

जुड़ गई थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था

बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है

कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएँगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं

कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें

बोला कृष्ना से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से

पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में

दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर

क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया

कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो

देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारो के यहाँ
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ

जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है

भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाँहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ

आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई

वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही

जानते हैं आप मंगल एक ही मक़्क़ार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है

कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज़्ज़त रहे्गी आपकी

बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया था

क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था

रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था

सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में

घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
"जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने"

निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर

गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर "माल वो चोरी का तूने क्या किया"

"कैसी चोरी, माल कैसा" उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस होश फिर जाता रहा

होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -

"मेरा मुँह क्या देखते हो ! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो"

और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी

दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था

घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे

"कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं"

यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से

फिर दहाड़े, "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा

इक सिपाही ने कहा, "साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"

बोला थानेदार, "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो

ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है, जेल है"

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
"कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल"

उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को

धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को

मैं निमंत्रण दे रहा हूँ- आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में

गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही

हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए !
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कमल किशोर जैन
मेरी जबां पर था उसको भरोसा इतना,
मुझसे खुदको भुला देने की दुहाई ले ली,

कैसे बयां हो सितमगर के सितम,
छीन के हंसी इन लबों की हंसने की दुहाई ले ली.

यूँ रो के गुज़र दी शब हमने आँखों ही आँखों में,
के बेदर्द कहीं रोने की भी न मनाही कर दे.

यूँ बयां हुई गम-ए-दौरान की हकीकत,
संग तो रहा सनम, मगर संगे दिल बनकर 







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कमल किशोर जैन
तुम कहती हो की तुम्हे मुझसे प्यार नहीं है..
ठीक ही होगा....

क्या हुआ जो मेरा दुःख तुम्हारी पलकें भिगो देता है,
क्या हुआ जो मेरी नाराजगी तुम्हे सताती है,

क्यूँ फरक पड़ता है तुमको रूठ जाने से मेरे ,
क्यूँ मेरी चिंता में पड़ते है पेशानी पर बल तेरे,

यूँ ही करती होंगी तुम फ़िक्र मेरी शामो-सहर,
यूँ ही बांटे होंगे मुझसे रंजो-गम अपने,

क्यूंकि हमेशा सच ही तो कहती हो तुम,
ये भी सच ही होगा की.... तुमको मुझसे प्यार नहीं.


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कमल किशोर जैन
(दुष्यंत जी की लिखी ये कविता मेरे साथ मेरे अज़ीज़तम कुछ ओर लोगो को बहुत पसंद है. इसलिए जब उनसे दिल की बात कहने का मोका आया तो इसका सहारा लेने से खुद को रोक नही पाया. कविता का मूल भाव दुष्यंत जी का ही है.... मैने बस अपने मन की बात कहने के लिए उनके शब्दों मे कुछ हेर फेर किया है... जिसके लिए मैं दुष्यंत जी से क्षमाप्रार्थी हूँ.)

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ
मेरा वो प्यार आपको बताता हूँ

एक समंदर सा है उसकी आँखों में
मैं जहाँ डूब जाना जाता हूँ

वो किसी रेल-सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ

हर तरफ़ ऐतराज़ होता है
मैं अगर उसके पास जाता हूँ

वो मुझसे रूठ गई है जबसे
और ज़्यादा उसके करीब पाता हूँ

मैं उसे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ

कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ








(अपने इस दुस्साहस के लिए दुष्यंत जी सहित उनके लाखो प्रशंसको से क्षमाप्रार्थी हूँ )
कमल किशोर जैन
आखिर हम लोग क्यूँ निराशा को बुरा मानते है. ये नैराश्य भी तो जीवन का अहम् अंग है. अगर इन्सान की जिंदगी में महज खुशियाँ ही तो शायद उसको इनके मायने भी मालूम न हो... पर अगर किसी इन्सान को लाख गम उठाने के बाद ख़ुशी की एक छोटी सी भी खबर सुने दे तो वो उसे सहरा में पानी की बूँद नजर आती है. ये निराशा और दुःख ही है जो हमें जीवन में पीछे मुड के देखना सिखाती है. हमें हमारी गलतियों का एहसास कराती है. जिन्दगी की भाग दौड़ में हम अक्सर अपने आप का विश्लेषण करना कहीं छोड़ देते है.. निराशा से भरा समय हमसे वो भी करवा देता है. लगभग यही वो समय होता है जब इन्सान अपने गुनाहों का प्रायश्चित करता है. यही वो समय है जब इन्सान अपनी खूबियों-खामियों को जानने की कोशिश करता है. यही वो समय होता है जब अपने पराये का भेद मालूम पड़ता है... यही वो समय है जब इन्सान अपने दुखो से लड़ना सीखता है... अपनी गलतियों से सबक लेकर फिर से उठ खड़ा होना सीखता है. इसलिए कहता हूँ की... नैराश्य भी हमारे जीवन का ही एक अहम अंग है. इससे दूर भागने की बजाय इसका सामना करना सीखे...






कमल किशोर जैन
हां तो भाई लोग, देखो जैसा की हमारी हिन्दी फिल्मों में बडे भाई, दोस्त और हितैषी राय देते है, मै भी राय दे रहा हूं कि ईश्क मौहब्बत जैसी फिजूल कि चीज से दूर ही रहों। पर अगर फिर भी तुमने ठान ही लिया है तो आज मैने भी तुमको एक लम्बा चौडा लेक्चर मारने की ठान ली है। सही भी जब बन्दे ने गाडी का एक्सीडेन्ट करने का मन बना ही लिया है तो लगे हाथ मै अपना ज्ञान झलकाने में पीछे क्यूं रहूं ?
देखो भाई लोगो.... अच्छा एक मिनट इससे पहले कि ये एनजीओ वाले मुझ पर जेण्डर बायस पर बात करने का आरोप लगा दें। मै साफ कर दूं मै बार बार भाई लोग इसलिये कह रहा हूं कि ये छिछोरापन हम लडकों के हिस्से में ही आया है इसलिये समझाना भी तो उन्हे ही पडेगा। खुदा कि नेमत से ये हसीन चेहरे तो बेचारे हमेशा से ही मासूम होते आये है। अव्वल तो बन्दे की गाडी का एक्सीडेन्ट करवाने में इनका कोई योगदान होता ही नहीं है, गर हो भी तो बाद में बडी मासूमिसयत से ये कह भर दे कि देखो जी! मै घरवालों के खिलाफ नहीं जा सकती। बस हो गया बन्दा खल्लास। इसलिये आज का ज्ञान हर वीकेन्ड पर सच्चा प्यार कर बैठने वाले भाई लोगो के नाम..
हां तो भाईयों.. देखो अगर तुमने एक बार फिरसे अपनी रातों की नींदे, अपना सुकून तबाह करने का मन बना ही लिया है तो सुनो... देखो अपना प्यार जगाने के लिए सबसे पहले शाहरूख खान की कोई अच्छी सी फिल्मे देखो... वैसे अच्छी क्या वो तो वैसे भी अपनी हर फिल्म में दूसरे की गर्लफ्रेण्ड को लेकर भागने का आदि है। क्या है ना उससे तुमको भी हौसला मिलेगा कि किसी को भी पटाया जा सकता है। फिर अपने मोबाईल में अलग अलग जोनर के गाने, गजले लोड करवाओ, पता नहीं मिलने वाली लडकी का कैसा टेस्ट हो? फिर ना शहर कि सिटी बसों में बडे शरीफ और सज्जन बनकर घूमो.. थोडा होमवर्क करो। और मालूम करो कि तुम्हारा लक्ष्य क्या है.. अर्जुन बन जाओ बेटा। और जब कोई लडकी तुम्हारे साथ अपना कीमती टाईम बर्बाद करने को तैयार हो जाए तब तुम भी कमर कसके जंगे आजादी के मैदान में कूद पडो। फिर देखना मैडम जो तुमको टोकना शुरू करेगी... ऐसा नहीं करो वैसा करो... स्मोकिंग मत किया करो, बीयर से मोटापा बढता है, मन्दिर जाने से भगवानजी आशीर्वाद देते है, तुम्हारे दोस्त अच्छे नहीं है... और जब पांच-छः महिने में पठ्ठा मिनी मुरारी बापू बन जाए तो फिर किसी रोज क्रिस्टल पाल्म में आईनोक्स थियेटर में बैठ कर मूवी देखते देखते तुमको बोलेगी, जानू! अब तुम पहले जैसे नहीं रहे। तो भाई लोग, अपने आप को बदलने के लिए तैयार हो जाओ और कूद पडो.... पर एक बात कहूं, सब करना पर कभी किसी का दिल नहीं तोडना..


कमल किशोर जैन
हे री मैं तो प्रेम दीवानी , मेरा दर्द न जाने कोय ,
सूली ऊपर सेज हमारी , किस विध सोवण होय |
गगन मंडल पे सेज पिया की , किस विध मिलना होय ||
घायल की गति घायल जाने , कि जिन लायी होय |
जौहरी की गत जौहरी जाने , कि जिन जौहर होय ||
दर्द की मारी बन बन डोलूं , बैद मिलिया नहीं कोय |

मीरा की प्रभु पीर मिटेगी , जब बैद सांवलिया होय ||
प्रेम में ऐसा मुकाम मिल पाना हर किसी के नसीब मे कहाँ... जहाँ "मैं" ख़तम हो जाए वहीं से सच्चे इश्क़ की शुरुआत होती है.. इसी समर्पण भाव के चलते "मीरा" को तो उसके "श्याम" मिल गये.. पर हम सब किसी ना किसी दुनियादारी के खेल मे इस कदर फँसे है की अपने कृष्ण को पाना तो दूर... उसे पहचान तक नही पाते है. दरअसल प्रेम का स्वरूप ही इतना उद्दात है की उसमे व्यक्ति का अहंकार, उसका Ego सब मिट जाते है. पर उसके लिए जरुरी है की प्रेम में समर्पण का भाव आये. क्यूंकि जब तक हमारे मन में अपने प्रियतम पर अधिकार की भावना रहेगी.. प्रेम में इर्ष्या और जलन का भी स्थान रहेगा.. और ये इर्ष्या और जलन ही एक दिन शक और संदेह को जन्म दे देते है. और जब ये भाव किसी रिश्ते में आ जाये तो उसका ख़तम हो जाना भी सुनिश्चित सा हो जाता है. इसलिए प्रेम में कभी अधिकार का भाव न आये. दूसरा हम सभी इन्सान है ऐसे में हममे इंसानी गुण-दोषों का होना भी लाज़मी है.. इसलिए हमें कभी ये आशा नहीं करनी चाहिए की हमारे प्रिय में सिर्फ खूबियाँ ही हो खामियां न हो.. साथ ही उसका फिजूल विश्लेषण भी न करें.. बस समर्पित कर दें अपने आप को अपने प्रिय के लिए, अपने प्रेम के लिए.. बिना किसी सोच विचार के... फिर देखिये ...
(मीरा बाई का स्केच www. barunpatro.blogpost से साभार)


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कमल किशोर जैन
(एक बार फिर से मुझे अपनी भावनाओं, अपने प्रेम को अभिव्यक्त करने के लिए आलोक जी के शब्दों का सहारा लेना पड़ा. दरअसल जब मैंने उनके काव्य संग्रह "वेरा! उन सपनो की कथा कहो" में लिखी उनकी इस रचना को पढ़ा तो मुझे लगा की ये सब वही है जो मैं न जाने कब से चाहता था. वही शब्द... वही भाव... बिना आलोक जी की अनुमति के उन्हें यहाँ पेश कर रहा हूँ... हालाँकि लगभग पूरी कविता ज्यों की त्यों वही है जैसी आलोक जी ने लिखी थी... बस अपने अनुसार कुछ शब्दों का मामूली सा हेर फेर किया है... बहरहाल पूरी की पूरी कविता आलोक जी की लेखनी को समर्पित.)





मैं तुम्हें प्रेम करना चाहता था
जिस तरह से तुम्हें किसी ने नहीं चाहा
तुम्हारे भाई, पिता, मां और यहाँ तक की तुम्हारा जीवनसाथी भी..
जिस तरह से तुम्हें नहीं चाह सके
मैंने चाहा था तुम्हें उस तरह से चाहना
चांद सितारों की तिरछी पड़ती रोशनी में
दपदपता हुआ तुम्हारा चेहरा
बहुत करीब से देखना....

तुम्हें छूने की इच्छा थी
तुम्हारे शरीर के हर हिस्से को
खुद में जज़्ब कर लेने की गहरी कामना भी
पर इन सब से ऊपर थी
तुम्हारे होठों की हंसी को
सदा फूलों में डूबा देखने की ख्वाहिश
सबसे परे था
बहे जा रहे समय के इस दरिया में
इत्तफाकन मिले तुम्हारे साथ को
बड़ी लौ से बचाये रखने का यत्न
देर तक तुम्हारे हांथों को
बहुत कोमलता से
अपने हांथों में सहेज रखने की भोली इच्छा

मैं चाहता था
तुम्हारा बचपन तुम्हारे कैशोर्य को खुद जीना तुम्हारे साथ
तुम्हारे अतीत की गलियों, मोहल्लों, शहरों मे जाना
जिस नदी के जिस किनारे कभी तुम ठहरी हो कुछ पल को
अपनी हथेलियों में वहां उस नदी को उठा लेना
जो फूल तुम्हें सबसे प्रिय रहे कभी
उनकी एक-एक पंखुरी को हाथ में ले कर देर तक सहलाना
जो गीत कभी तुमने गाये थे
उनके सारे बोल
सदा को इस पृथ्वी पर गुंजा देना

बहुत भोली थीं मेरी इच्छायें
उन इच्छाओं में तुम सिर्फ नारी नहीं रहीं
न कोई सिर्फ बहुत प्रिय व्यक्ति
सिर्फ साथी नहीं
फिर भला सिर्फ प्रिया
सिर्फ कामिनी ही कैसे होतीं !

तुमको इस तरह धारण किया खुद में
जैसे दरख़्त शरद की हवाओं, वन के रहस्यों और
ऋतु के फूलों को करते हैं
तुम स्वप्न नहीं थीं मेरे लिये
न सुंदर वस्तुओं की उपमा
मैंने सोचा था कि
तुममें मेरे जीवन का कोई बहुत गहरा अर्थ है

पर तुम्हारा जीवन क्या था मुझमें ?

यहीं से वह प्रश्न शुरु हुआ
जिसके फंदों में हर शब्द उलझ गया है...

मेरी भोली इच्छाओं पर
तुम्हें चाहने
और खु़द को चाह पाने का योग्य बनाने की कोशिशों पर
दुख की तेज चोटें पड़ रही हैं ....

तुम कभी जानोगी क्या कि अपने दिल की आंच में
तुम्हारे लिये बहुत करीब से मैंने क्या महसूस किया था...?

तुम यक़ीन करोगी तुम्हारे लिये
कितनी अनमोल सौगातें थीं मेरे पास....
विंध्य के पर्वत थे
सतपुड़ा के जंगल
गंगा की वर्तुल लहरें
नक्की का शीतल जल..
पलाश के इतने फूल जितनी पृथ्वी पर नदियां
तारों भरी विंध्य की रात, कास के फूल
कनेर की पत्तियां
पहाड़ी गांवों की शामें
और कुछ बहुत अकेले खंडहर
कुछ बहुत निर्जन पुल
सौंदर्य के कुछ ऐसे सघन बिंब
जिन तक काल की कोई पहुंच नहीं
और दिल के बहुत भीतर से उठी एक सच्ची तड़प...

सुनो, यह सब तुम्हारे लिये था
और यह सब आज बिलख उठा है
- ये जंगल, पर्वत, लहरें
ये फूल, नदी, शाम और खंडहर

तुम होतीं तो इन्हें एक अर्थ मिलता
इनका एकांत यों भी होता
जैसे आकाशगंगाओं में तारों की हंसी गूंजे
इन्हें सिर्फ प्यार नहीं एक संबंध चाहिये था
एक संबोधन चाहिये था ...
एक स्पर्श और एक हंसी चाहिये थी
अफसोस ! ऐसा कुछ न हुआ
और इन सब में गहरे उतर गये हैं
दुख के मौसम और उदासी के बोल ....

तुम्हारे इसी नगर में मैं
इस सब के साथ थके कदमों से गुजरता हूँ
कभी तुम्हारे घर के सामने से भी
कभी बहुत दूर उन रास्तों से
उन लोगों से, उन इमारतों और उन दरख़्तों से
जो तुमसे आश्ना थे
पर यह दर्द है कि बढ़ता ही जाता है
गो कि कभी कभी लगता है कोई रंजो-ग़म नहीं
फ़क़त उदासियां हैं शाम की ....
और मैं....
मैं आज भी तुम्हे प्रेम करना चाहता हूँ...
कमल किशोर जैन
पिछले दिनों चर्चित पाकिस्तानी फिल्म "बोल" देखी. हालाँकि जिन लोगो ने इन्ही निर्देशक महोदय की "खुदा के लिए" देखी होगी उन्हें ये फिल्म थोड़ी कमतर लगी होगी, मगर फिर भी अपने तमाम झोलों के बावजूद पाकिस्तान के माहौल को देखते हुए इतनी यथार्थ परक फिल्म बनाने के लिए निर्माता-निर्देशक को कोटिश: साधुवाद. 
दरअसल फिल्म की शुरुआत की बड़ी दमदार है. चंद घंटो बाद फांसी के फंदे पर झूलने वाली लड़की का मीडिया के सामने अपनी कहानी बयां करना, पलकों के कोरों को भीगने के लिए काफी था. उसके बाद जैसे जैसे फिल्म बढती गयी एक के बाद एक नायिका के जख्म उघड़ने लगे. मुस्लिम परिदृश्य में लिखी इस कहानी में लगभग हर दूसरी महिला की कहानी नजर आती है, भले देश कोई हो हमारे यहाँ औरतों की कमोबेश यही स्थिति नज़र आती है. उन्हें या तो महज बच्चे पैदा करने की मशीन समझ लिया जाता है या हुकुम की तामिल करने वाली बांदी. फिल्म में कुछ पात्र बड़ी ही शिद्दत के साथ लिखे गए है.. मसलन हर बात को तार्किक रूप से सोचने और उस पर अडिग कड़ी नायिका हो या सब कुछ जानबूझ कर चुपचाप सहन करती उनकी लाचार मां... पिता से छुप कर आकाश में उड़ने के ख्वाब बुनती नायिका की बहन. या उन सब से अलग थलग अपने नपुंसक होने का दंश झेलता सैफू. और उन सब पर भारी बात बात पर अपनी खीज मिटने को घर की औरतो पे हाथ उठता नायिका का पिता. सभी किरदार कहानी को आगे बढ़ाने में अपना सहयोग करते है. फिल्म की कहानी तो मन को झकझोरने वाली है ही..   संवाद उससे भी जानदार.. मसलन ...
नायिका का ये कहना की "हर बरस हमारे घर दाई आने लगी". या "मर्द हो, इसलिए जब लाजवाब हो गए तो हाथ उठा दिया." इसी तरह जब सैफू मर्द होने के गुण बताता है तो कहता की  "मर्द बनने के करना ही क्या होता है.. थोडा माथे पर त्योरियां चढ़ा लो, आवाज को भारी बना लो, बदजबान बनो... और घर की औरतो को दो-चार हाथ जमा दो."
बहरहाल अपनी हर बेवकूफी के लिए खुदा/भगवान को जिम्मेवार ठहराने वालो... सहित आप और हम जैसे आम आदमियों को भी सोचने पर मजबूर करती है की... सिर्फ मारना ही जुर्म क्यूँ है.. पैदा करना क्यूँ नहीं?