कमल किशोर जैन

इन्होने भगवा को छीना,
उन्होंने हरे को..  
मैंने सफ़ेद चुना,  
और शांति से जिया..

इन्होने मदरसों में आतंक की घुट्टी दी,  
उन्होंने सरस्वती के मंदिरों में जहर भरा..  
भला हुआ जो 
मैं निपट अज्ञानी रहा.

मौलाना अजान में डूबे रहे,  
पंडित जी ठाकुर के भोग में..  
उधर वो बच्ची 
भूख से तड़प कर मर गयी

इन्होने विधर्मियों को मारा  
उन्होंने काफिरो को  
मैंने इंसानियत को चुना..  
मैं बेबस हर रोज मरा..

इन्होने गोधरा चुना
उन्होंने मुजफ्फरनगर उजाडा
मुझे शांति की तलाश थी... 
जो किसी मासूम की मुस्कान में मिली.



© कमल किशोर जैन (12 सितम्बर 2013)
 





कमल किशोर जैन
मैं अक्सर सोचा करता था की
खुशियाँ यूँ ही नहीं आती है... बेमकसद
ना ही कोई मुक्कमल तरीका है
हमेशा खुश रहने का
भले कोई लाख जतन कर ले
मगर हमेशा खुश रहना
किसी के बस की बात नहीं... किसी के
मगर मैं गलत था
यक़ीनन सौ फीसदी गलत
दरअसल बड़ा आसान है खुश रहना
उपरवाले ने छोटी छोटी चीजो में हमें
ये ख़ुशी की नियामत बख्शी है
मसलन कभी क्लास से बंक मारने की भी एक ख़ुशी है
दोस्तों के साथ घूमना, घंटो किताबे पढ़ना
गाने गुनगुनाना, फ़िल्में देखना
कभी "उनके" साथ होना, कभी "उनके" बिना होना
हर छोटी से छोटी बात में खुशियाँ छिपी होती है
कभी बच्चो की धींगा मस्ती में
तो कभी उनके बेवजह इतराने में भी
वो कभी माँ के हाथ की चपातियों में होती है
कभी मिटटी की सौंधी सी महक में
जिन यादों पर आंसू निकला करते थे
कभी उन्ही यादो में भी छिपी होती है ख़ुशी
ऐसी ही न जाने कितनी अनगिनत छोटी छोटी बातों में
छिपी होती है जीवन की खुशिया
ये तो बस हम ही है,
जो उन्हें ढूंढ नहीं पाते
और यूँ ही बेमतलब
दुखो को जीवन भर लादे फिरते है..

...बेमकसद

© कमल किशोर जैन (3 सितम्बर, 2013)





कमल किशोर जैन

अगर ये सच है की
इतिहास सदा राज सिंहासनो के पाए तले लिखा जाता है
तो फिर क्यूँ हमें कबूल नहीं
की इतिहास सिर्फ वो नहीं जो
राम, कृष्ण या अशोक को महान बताता है
इतिहास उन तमाम नष्ट किये,
जलाये कुचले पन्नो में भी
दर्ज हो सकता है
जो आज भी नरकासुर की चुराई गयी
सोलह हज़ार रानियों के आंसुओ में शामिल है,
जो आज भी फूटी पड़ी ताड़कासुर की ताड़ी की हांडियो में है,
जो आज भी किसी क्षत्रिय को श्रेष्ट धनुर्धर बनाने के लिए
किसी आदिवासी के कटवाए गए अंगूठे में सिसकता है,
यक़ीनन वो भी हमारा ही इतिहास है
मगर न उस इतिहास पर किसी को गर्व है, न ही शर्म
वी इतिहास की तमाम कहानियो से उपेक्षित
पड़ा है अधनंगा सा,
अगर कभी इस इतिहास को पलटा गया
तो जो सच सामने आएगा
वो न जाने कितने कितने भगवानो के
चेहरों पर पड़े नकाब हटा देगा
न जाने कितनी आस्थाए धूमिल होंगी
ना जाने कितने शोषितों को न्याय मिल पायेगा
मगर ऐसा शायद ही हो पाए
क्यूंकि सच तो यही है
इतिहास सदा सिंहासनो के पाए तले लिखे जाते है...


© कमल किशोर जैन (29 अगस्त 2013)


कमल किशोर जैन

वहां जान उस मासूम की गयी,
इधर नेता एक नया तैयार हो गया,

अब उसकी लाश के भी सौदे होंगे,
सरे आम उछाली जायेगी उस मासूम की इज्जत

बेमौत मरी गयी उस निरीह को न्याय दिलाने के नाम पर
न जाने कितने बेगुनाहों को सताया जायेगा

खबरों की भूखी दुनिया को लंबे समय तक
अलग अलग मसालो के साथ परोसी जायेगी ये खबर भी

फिर चलेंगे आंदोलनों और श्रद्धान्जलियो के दौर
आखिर हर कोई क्यूँ नहीं चाहेगा, उसकी चिता पर अपनी रोटियां सेकना

आखिर इतनी आसानी से कहाँ मिलता है हर रोज कोई मुद्दा
और फिर यूँ तो नहीं बन जाता है कोई जन नेता

जाने पद के भूखे इन नेताओ को सत्ता के शीर्ष पर पहुँचाने के लिए
अभी और कितनी मासूमो को बलि पर चढाना होगा..


© कमल किशोर जैन (17 अगस्त 2013)