कमल किशोर जैन
तुम हर एक रिश्ते में मुकम्मल होती हो,
जब तुम मेरी माँ थी तो लगता था की हर जन्नत यही कही तेरे कदमो तले ही तो है,
फिर जब तुम बहन बनी तो लगा मेरी हर मुसीबत का हल एक तुम्ही तो हो,
मेरे कठिन दिनों में मेरी ताकत बन साथ कड़ी मेरी प्रेयसी भी तुम्ही तो थी,
मुझे हर कदम गलत राह पर जाने से रोकने वाली वो अज़ीज़ दोस्त भी तुम्ही तो थी,
मेरे हर दुःख को अपना मान घंटो अपनी पलकें भिगोने वाली
मेरी पत्नी बन जो जीवन में आई, वो भी तुम्ही तो हो,
और अब मेरे अरमानो, मेरे सपनो को हकीकत की ज़मीं दिखने वाली
वो मासूम बिटिया भी तो तुम्ही हो,
फिर कैसे कह दूँ की चंद बरस के इस जीवन में
तुम्हारी कोई जगह ही नहीं

सच कहूँ तो इस जीवन में
तुम्हारे सिवा कुछ और है ही नहीं.


© कमल किशोर जैन (12 अगस्त 2013)






कमल किशोर जैन


मुझे नहीं आता शब्दों का तिलिस्म रच पाना
ना ही मुझमे शब्दों की अबिधा से खेल पाने का सामर्थ्य है
मुझे नही सुझाते भावो के शाब्दिक पर्याय
ना ही मैं ढूंढ पाता हूँ अपने मन का कोई समानार्थी
मैं नहीं रच पाता हूँ कोई अद्भुत कविता..
मुझे चाहिए बस दो पल के लिए तुम्हारा साथ
क्योंकि जब तुम और मैं साथ होते है तो.
फिर नहीं होती है किसी साहित्य की जरुरत
न ही किसी मुकम्मल भाषा की
तब हमारे भाव ही पर्याप्त होते है
हमारी मनोदशाओ को व्यक्त करने हेतु
और तब जो अशाब्दिक कविताये जन्मती है
वो अक्सर ही हुआ करती है....

विलक्षण और अद्भुत..


 














© कमल किशोर जैन (11 अगस्त 2013)


 
कमल किशोर जैन

कितनी आसानी से कह दिया था मैंने

की निभा लूँगा मैं तुम्हारे बिना,

अब याद भी नहीं करूँगा तुम्हे

मगर तुम हर पल याद आते हो

जब किसी कठिन क्षण में

नहीं होता है कोई सहारा

जब नहीं समझ पाता हूँ

दुनियादारी के दांव पेच

जब याद आते है वो पल

जो नसीब हुए थे सिर्फ तुम्हारी वजह से

एक तुम्हारे ही भरोसे तो चल पड़ता था

कहीं भी, कभी भी

जब कोई गलती करने से पहले कुछ सोचना नहीं पड़ता था

मालूम था, की हर गलती सुधारने को

तुम साथ ही हो..

यहीं कहीं.. मेरे साथ.. मेरे पास

मगर अब जब तुम नहीं हो

तुम्हारी याद हर पल आती है..

पापा.. काश तुम यूँ नहीं गए होते

तो मैं आज भी मैं ही होता..

यूँ इतना बदल नहीं गया होता.

मैं हर पल यही कोशिश करता हूँ

की बन सकू तुम्हारे जैसा

जबकि मैं ये भी जानता हूँ की

ये मुमकिन ही नहीं.. कभी नहीं

पापा.. तुम जैसे बस तुम्ही थे..

कोई और नहीं..

© कमल किशोर जैन (11 अगस्त 2013)



पापा - पूरण चंद जैन (जिनके बिना जीना इतना आसान नहीं रहा)

कमल किशोर जैन
वो ऐसा ही कोई अगस्त का महीना था
जब तुम थे और मैं था
और साथ थी नक्की की वर्तुल लहरे
चांदनी रातें और शीतल हवाएं
इतने दिनों के हमारे रिश्ते को जब एक नाम मिला
वो ऐसा ही कोई अगस्त का महीना था...
कहते है पहाडो में प्रेम की जड़े होती है सबसे गहरी,
वही बहा करती है प्रेम की बयार
सबसे गहरी, सबसे असरदार..
उन्ही पहाडो पर तो पनपा था हमारा ये प्रेम
जो अब तक असरदार है, उतना ही गहरा..
उन पहाडो पर जब हम संग चले थे
वो ऐसा ही कोई अगस्त का महीना था..



© कमल किशोर जैन (09 अगस्त 2013)


कमल किशोर जैन
हर गांव में होता है
एक बुढा बरगद
जो जानता है 
उस गांव की हर एक कहानी
उस गांव का हर दुःख,
हर दर्द
जो शामिल होता है 
उस गांव की हर खुशी में
मगर अफ़सोस... 
मेरे गांव में अब कोई बरगद नहीं बचा
यानि.... हर कटते बरगद के साथ ही कट गयी
मेरे गांव की हर कहानी
न जाने कितनी अल्हड जवानियो के किस्से
न जाने कितने मासूम बचपन की यादे..
अब कहा होगी गांव के बड़े बुढो की चौपाले
अब कहा होगी तीये को बैठके,
तपती जून की भरी दोपहरी मे
एक नया ठीया बनाना होगा... 

© कमल किशोर जैन (04 अगस्त 2013)


कमल किशोर जैन
मुझे शब्द पसंद थे तुम्हे मौन..
मुझे भीड़ चाहिए थी, तुम्हे एकांत..
मुझे अफसाने उकसाते थे, तुम्हे जमीन की हकीकत..
मुझे बागी बन जाना था, तुम्हे तुम्हारे संस्कार रोकते थे..

...फिर भी मुझे तुम पसंद थे, तुम्हे मैं

और अब जान मैं बिलकुल तुम्हारे जैसा हो गया हूँ..
ना मुझे शब्दों से प्यार रहा ना भीड़ से,
अब ना कोई अफसाना मायने रखता है
ना ही मुझे बागी बन जाना है..

फिर भी ना जाने क्यों...

मुझे तुम पसंद हो


और


.....शायद तुम्हे मैं



© कमल किशोर जैन 30 जुलाई 2013
कमल किशोर जैन
तुम बिलकुल भी तो नहीं थी..
अप्रतिम... अद्वितीय... अद्भुत..

ना ही तुम्हारा मुख चन्द्रमा सा था
ना ही तुम्हारे बाल,  काले मेघ
ना तुम्हारी आंखे मानसरोवर सी थी
ना तुम्हारे होठ कमल

तुम भी औरों जैसी ही तो थी
वो ही हाड-मांस से बनी
वो ही रगों में बहता खून, बदन से बहता पसीना
औरों की ही तरह बात बात पर रूठना
बिलकुल ऐसी ही तो थी तुम

फिर क्या था जो तुम्हे बना देता था
अप्रतिम... अद्वितीय... अद्भुत..

संभवतया वो अगर कुछ था तो
अनंत प्रेम, समर्पण, निश्छल स्नेह
जो संभव ही नहीं था कहीं और पा सकना
वही तो था, जो मैं तुमसे किया करता था..
प्रेम.. सिर्फ और सिर्फ प्रेम..


- कमल किशोर जैन. 13.6.2013


कमल किशोर जैन
कितना कुछ था हमारे दरमियाँ.. बेवजह सा
वो बेवजह तेरा हँसना.. वो बेवजह की मेरी नाराजगियां,
बेवजह ही होगा तेरा यूँ मेरे दिल में उतर जाना,
बेवजह ही तो था तेरा मुझमे सिमट जाना,

गर उस वक्त तेरे संग-ओ-साथ को कुछ मुकम्मल वजहे मिल जाती,
तो आज शायद यूँ बेवजह जीना नहीं पडता,
कुछ रिश्ते यूँ बेवजह निभाने नहीं पड़ते,
कुछ यादें यूँ बेवजह संजोनी नहीं पड़ती,

जाने क्यूँ उस प्यार को कभी कोई वजह ही ना मिल पाई,
या जाने यूँ बेवजह जीना ही जिंदगी बन गई..


- कमल किशोर जैन.13.6.2013
कमल किशोर जैन


सुना है...
वेरा ! अब भी उन सपनो की कथा सुनाती है,
अब भी आनासागर के किनारे प्यार की कसमे खायी जाती है,
दरगाह जाते हुए... मदार गेट पर अब भी किसी का यूँ ही इंतज़ार होता है,
बस स्टेंड की पार्किंग अब भी उसकी एक्टिवा से गुलज़ार है,
उसकी कमर अब भी पुष्कर की घाटियों सी बल खाती है,
उसकी आवाज में आज भी पुष्कर के घाटों सी शांति है,
अब भी कोई उसके कांधे पर सिर रख कर सुकून से सो जाना चाहता है,
माया मंदिर में आज भी उसका इंतज़ार होता है,
हाथ में मेंगो पकडे.. अभी उसमे मसाला ढूंढा जाता है,
सुना है वो अब भी यूँ ही मेरा इंतज़ार करती है,
सुना है वहा ऑटो में हम तुम घुमा करते है...


सुना है... सुना है..

ख्वाजा साहब की दरगाह 

मदार गेट 

माया मंदिर 

पुष्कर घाट 




कमल किशोर जैन
लो आज आखिर आ ही गया
आखिरी दिन ..

हमारे प्रेम का,
हमारे समर्पण का,
हमारे सपनो का,

हर उस लम्हे का
जो हमने बियाते थे
एक दुसरे की यादों में खोये हुए

उन लम्हों, उन यादों के बिना
कैसे होगा मुमकिन मेरा जीना
या शायद जी भी लूं

मगर तेरे बिना वो जीना
कभी जीना नही होगा

जैसे तेरे बिना जीना कभी जीना था नहीं ……