कमल किशोर जैन
देश के हर दूसरे गांव जैसा ही एक गांव ये भी था. नाम रहने भी दे तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है. इसी गांव में दो लोग थे. दोनों के मजहब अलग दोनों के परिवार अलग.. फिर भी दोनों एक दूसरे से प्रेम करते थे. सयाने कहते थे की ये प्रेम नही केवल उम्र का तकाज़ा है पर उन दोनों का मानना था की उन्हें प्रेम है. सो उसी प्रेम की गिरफ्त में एक दिन दोनों ने सोचा की वो एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते लिहाज़ा उन्हें शादी कर लेनी चाहिए 
"मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता" - लड़के ने कहा, "अब हमें जल्द ही शादी कर लेनी चाहिए."
"वो तो ठीक है पर तुम्हे हमारा धर्म कबूल करना पड़ेगा वरना अब्बा नहीं मानेंगे" - लड़की ने भी मजूरी जताई.
"मैं क्यूँ अपना धर्म बदलू तुम क्यों नहीं मेरा धर्म स्वीकार कर लेती हो, दोनों चैन से जियेंगे... वैसे भी शादी के बाद तुम्हे कोनसा अपने अब्बा के घर जाना है." - लड़के ने तर्क दिया.
"नही ऐसा नहीं हो सकता, अगर तुम मुझसे प्यार करते हो और शादी करना चाहते हो तो तुम्हे मेरा धर्म अपनाना ही पड़ेगा" - लड़की ने अंतिम हथियार फेंका.
"अगर ऐसा है तो ठीक है तुम मुझे भूल जाना, मैं अपना धर्मं नहीं बदलूँगा" और लड़का बिना मुड़े चला गया.. लड़की भी बिना पलटे वहां से चली गई...

एक बार फिर जात-धर्म जीत गए.. और प्यार हार गया.


कमल किशोर जैन
सच कितना मजबूर है मेरा प्रेम...
और उतनी ही निष्ठुर तुम
जितना मुझसे ये करीब होता जाता है
तुम मुझसे उतनी ही दूर चली जाती हो

....और मेरे पास रह जाते है
फकत तेरी यादों के साये..
चंद अल्फाज़.. और आँखों में ये नमी






कमल किशोर जैन

जानता था कभी मूर्त रूप ले ही नहीं पाएगा हमारा प्रेम

हालाँकि मैंने तुमसे ही जानी थी छुअन प्यार की

गाहे बेगाहे यूँ ही छू लिया करता था तुम्हे

मेरी सांसो में अब भी बसी है तुम्हारे बदन की खुशबू



अपने तमाम समर्पण के बावजूद जानता था

कभी तुम पर कोई हक नहीं जाता पाउँगा

क्यूँ की ये हक ना जाने क्यूँ

तुमने अनायास ही दे दिया था किसी और को



हालाँकि प्रेम का उन्माद तुम पर भी तारी था

मगर हमारा ये सभ्य और सुसंस्कृत समाज

किसी इंसान को दो बार प्रेम करने की इजाजत नही देता

और गलती से वो इंसान "स्त्री" हो


.....तो कतई नहीं.... हरगिज़ नहीं


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कमल किशोर जैन
दुनिया की हर कहानी की तरह ही होगा
इस कहानी का भी
प्रारंभ और अंत
बिलकुल सामान्य; संभवतया कुछ उजला कुछ स्याह
परन्तु जो रहेगा सर्वाधिक रोचक और ज्वारीय
वो यही होगा.... यही यानि ये "बीच का हिस्सा"

इस कहानी का प्रारंभ तुमने रचा
अपनी ही तरह अल्हड, उन्मुक्त और निश्छल
और अंत रचा तुम्हारे अपनों ने .... तुम्हारे लिए
उदास, षड्यंत्रों और तमाम बंदिशों से युक्त
पर अपनी मरजी और इच्छाओ से
हमने मिलकर जो जिया
वो यही था..... यही यानि ये "बीच का हिस्सा" 

किसी उन्मुक्त नदी की मानिंद
प्रारंभ से ही रही तुम वेगवती
और किसी समंदर में मिल कर पाओगी
निज पूर्णता को तुम
पर सहस्त्रो लोगो और खुद तुम्हे
शांति और जीने का मकसद देगा
यही .... बस यही यानि ये "बीच का हिस्सा"

मुझे याद नहीं है लेश मात्र भी कुछ
ना अपना प्रारंभ ना अंत
सतत प्रयासों से भूल पाया हूँ मैं
ये व्यर्थ सा सब कुछ
बस रहा जो शेष स्मृतियों में मेरे
वो यही है .... यही यानि ये "बीच का हिस्सा" 



कमल किशोर जैन


(तकनीक अपने साथ कुछ नया तो लाती ही है पर वो अपने साथ पुराने को बिरसा भी देती है, टेबलेट, कंप्यूटर और ना जाने क्या क्या... एक छोटे से डिब्बे मे संसार समा लेने का दम भरते लोग... पर एक बात अक्सर भूल जाते है की जो सुख काग़ज़ पे छपे को आँखो से महसूस करके दिल-दिमाग़ में बैठा लेने का सुख है वो इन 7-8 इंच की हाई टेक स्क्रीन में देखने में नही है.... एक ऐसी ही खूबसूरत तुलना राजेश जी ने इस कविता में की है)







टेबलेट में स्क्रीन को टच
करके उन्हे पढ़ते देखा
चौखने में सारा
संसार टटोलते देखा
लेकिन!!!!
पढ़ने का मज़ा तो किताब में हैं
ये वो ही ले पाते हैं, जो
टच और स्पर्श का अंतर
जानते हैं....
किताबो की दुनिया निराली है
पन्नों को मोड़ना और
उलटना-पलटना
काग़ज़ की खुरदारहट या
चिकनेपन को शब्दों के साथ
महसुसना
नई किताब की खुश्बू को सूंघना
चेहरे पे किताब रखाके सपने देखना
तकिये के पास किताब को रखना और सो जाना
प्रिय पंक्तियों के नीचे पेंसिल से
पटरी बिछाना
एक साथ पतली किताब पी जाना
या फिर मोटी सी पोती को
महीनों तक दवा की तरह गुटाकते रहना
या बीच में छोड़ देना
किताब में काग़ज़ की पर्चिया डालना
रंगीन कवर को निहारना
और पहले पन्ने पर नाम और तारीख लिखना
भेंट में किताब देना या लेना
बहुत सुकून देता हैं
किताबो की दुनिया का मज़ा ही
कुछ और है
ये वो लोग ही ले पाते है, जो
टच और स्पर्श का अंतर जानते है

(ये कविता राजेश जी ने फलोदी से जयपुर के रास्ते में लिखी)
कमल किशोर जैन
जब माँ साथ हो तो किसी दुआ की ज़रूरत ही नही...

जब माँ साथ हो तो फिर से बच्चा बन जाने को जी चाहता है....
जब माँ साथ हो तो क्यूँ उसकी गोद में सिर रखकर सो जाने को जी चाहता है...
क्यूँ दिल भारी हो तो माँ से लिपट कर रोने को जी चाहता है...
क्यूँ उसकी आँखो का एक आँसू परबत सा भारी लगता है...
कैसे बिन कहे उसे हर बात का इल्म हो जाता है...
कैसे हर संकट मे उसका हाथ सर पर नज़र आता है....

माँ तुम साथ हो तो जीना आसान हो जाता है.
कमल किशोर जैन
कुछ दिन बीते... अचानक घिर आए बादलो ने अचानक बरसाना भी शुरू कर दिया था. मान कर रहा था की अभी ठीक से गरमी भी नही पड़ी ओर निकम्मे आ मरे फिर से ठंड बढ़ने के लिए... जैसे ही बारिश रुकी मैं छत की और चल दिया. बारिश के बाद की ठंडक को महसूस करना भी अपने आप मे एक सुखद अहसास ही है. तभी अचानक नथुनो से एक चिर परिचित सी सुगंध आ टकराई.. आसपास कोई खेत खलिहान तो नही थे फिर भी मैं सौ फीसदी आश्वस्त था की ये खुश्बू मिट्टी की ही है. पर मान था की मानने को तैयार ही नही था की इस सीमेंट के जंगल मे भी कही सौंधी मिट्टी की खुश्बू आ सकती है. मैने माँ से पूछा शायद उनको मालूम हो.. पर जैसा अक्सर होता है वो मेरे इन अजीबो ग़रीब कौतूहलो को हमेशा हंस के टाल देती है. इस बार भी उन्होने हंस के कह दिया "लड़के तू बौरा गया है, यहाँ कहाँ मिट्टी की खुश्बू" बात तो उनकी भी सही थी. मगर उस खुश्बू का क्या करूँ जो इन सांसो मे समा गई थी. जब कुछ समझ नही आया तो फिर से छत की और दौड़ लगा दी.. खुश्बू अभी तक बरकरार थी.. और मैं उस का स्त्रोत खोज रहा था. तभी पड़ौस मे रहने वाले 10 बरस के छोटू ने पूछा "भैया क्या ढूँढ रहे हो" एक बार तो मैने सोचा की इसे कहा मालूम होगा इस खुश्बू के बारे मे, पर बार बार उसके पूछने पर मैने उसे बताया तो वो ज़ोर से हँसने लगा... भैया आप भी ना, ये देखो आप की ही छत पर गमले रखे है. उन्ही से ये खुश्बू आ रही है.
.
.
सच में अमर बेल की तरह बढ़ते इन सीमेंट के शहरों ने हमसे कितना कुछ छीन लिया है.

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कमल किशोर जैन

इस बार आप लोगो के लिए पेश है एक बिलकुल नए कवि "राजेश उपाध्याय" की कवितायेँ... राजेश जी का परिचय फ़िलहाल इतना है की वे मेरे साथ ही काम करते है... कवितायेँ लिखने का शौक तो उन्हें अरसे से है, परन्तु अब तक जो भी लिखा वो अपने लिए ही लिखा... ये पहली बार है जब उनका लिखा कुछ किसी सार्वजनीक मंच पर है... लिहाज़ा आप लोगो की प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा....








बहस
एक दिन मैं चुपचाप बैठा था,
बाहर की दुनिया और
अन्दर के संसार में
बहस छिड़ गयी
मैं तो चुपचाप बैठा था
कुछ टुटा, कुछ चटका
कुछ गिरा, कुछ उठा
पानी बहने लगा
बादल उड़ रहे थे
कभी लहरें उछली
तो कभी पत्थर अटके
बहस बढती ही गयी
लेकिन मैं तो चुपचाप बैठा था
फिर लाइट बंद करके
मैं देखने लगा
और सब कुछ साफ
दिखाई देने लगा

बदलाव
सूखे पत्ते की कहानी सुनकर
भीगी मिटटी से बतियाकर
चिड़िया की फुदकन देखकर
सांप की केंचुली छूकर
धुप को सिमटते देखकर
पेड़ों से इतिहास पूछकर
मैंने "बदलाव" के बारे में
सोचना शुरू किया
आप भी सोचियेगा......



कमल किशोर जैन
रोज जहाँ से बढ़ता है दिल, वही लौट आना फितरत है इसकी,
मत घबरा ए दिल इतना, यूँ ही बेसबब जिए जाना आदत है इसकी...

*
गूंगा सा फिरता था गम ये मेरा, एक तेरे दर पर आस मिली,
लाख दयारे ढूंढी इसने, एक तुझसे लफ्जों की खैरात मिली..

*
तेरे इश्क में सोचा था खुदा बन गया हूँ मैं,
तुझसे बिछड़ा तो फकत इंसा भी ना रहा..

*
कब तलक करता सबर आखिर,
दिल ही तो था, फिर तुम्ही पे आ गया.

*
उससे बिछड़ कर हम उससे याद करते रहे..
वो बैठा बिछड़ने के तरीके को कोसता रहा..

*
ए चाँद, तू तो था सदियों से हमसफ़र मेरा,
उस से बिछड़ कर सुना है तू भी बेनूर हो गया..

*
तुम ना कहती थी के बहुत बोलता हूँ मैं,
लो, एक तुम्हारे जाने से चुप हो गया हूँ मैं...

*
सब कुछ भुला देने के बाद भी जो कुछ याद रहेगा
....वो तुम ही तो हो

*
यादें 
हमेशा अनहोनी की तरह क्यूँ आती है..
बिना बताए.. चुपचाप.. दबे पाँव.. 
और पिछे छोड़ जाती है.. बस ..वीरानीयाँ

*
इस जीवन में एक तेरा इश्क ही अब तक की कुल जमा पूंजी है..
न कुछ खोने का डर है.. न ही लूट जाने का भय..

*
वो जो सिखाते थे अक्सर सलीके मुझको,
जुदाई के बाद सुना है मुझ जैसे हो गए है

*
इस कदर तो नहीं हुए थे तर्के मरासिम दरमियां तेरे मेरे,
की तुझ बिन कैसा हूँ मैं, इसका भी तुझे इल्म नहीं.

*
मैं खता दर खता करता रहा
वो मुस्‍कुरा कर माफ करते रहे
*
जाने क्‍यूं आज चांद बरबस तेरी याद दिला रहा है

तेरी तरह बेबस--
तेरी ही तरह लाचार
और हां


......
तेरी ही तरह मुझसे दूर
*
मुद्दते गुजरी पर वो हो ना सके हमारे,
कुछ कमी थी मेरी या थी उसकी मजबूरी...
*
अब नहीं करता मैं तुझे याद उस कदर
मगर ऐसा भी नहीं की भुला ही दिया
*
जो सीखा था तुमसे वो भी प्यार ही था..
जो भुलाया तुमने वो भी प्यार ही था..
जो दिया था तुमने वो भी प्यार ही था..
जो छिना तुमने वो भी प्यार ही था...

मेरे जीवन में प्यार का जरिया तुम थी..
या तुम्हारा होना ही प्यार था..
*
तुम उदास हो तो सुबहे उदास,
तुम तन्हा तो दिन तन्हा...
*
अपनी अनगढ़ लिखाई में कभी लिखा था जो तूने
आज तलक संभाले हुए हूँ वो अनमोल खत...

रोमांस की निशानी मान जिस नीले कागज को चुना था तूने
अब धीरे धीरे पीला पड़ता जा रहा है...
समय के साथ धुंधला पड़ जाने की गरज से लिया था तूने पेन्सिल का सहारा
ना जाने क्यूँ वक़्त के साथ तेरा लिखा गहराता ही जा रहा है.
*
जिन्हे कराया था वजूद-ए-अहसास कभी,
आज मुझसे मेरी औकात पूछते है.
*
जानता हूँ फकत कुछ पलों का ही था साथ हमारा..
ये पल इतने जल्दी गुजरेंगे... ये पता नहीं था...
*
और अब तुम नहीं हो तो
कुछ भी नहीं होता,
*
क्या पता क्या साज़िशे थी खुदा की... उसको छोड़ जिसके भी करीब हुआ... उसी से जुदा कर दिया
*
वो जो पीछे छूट जाएँगे बाद रुखसत के तेरे
उन्ही वादों के सहारे गुजरेगा ज़िंदगी कोई
*
आज भी इस कदर मुझ पर तारी है तेरे इश्क़ का असर,
लेना हो नाम जब भी खुदा का, आए है तेरा ही जिकर...
 *
वो जो गुज़री थी तमाम राते इंतज़ार मे तूने मेरे...
इस रात के आगोश मे उनका भी हिसाब हो जाने दे..
 *
कयामत के दिन होगा हिसाब मेरी ख़ताओ का
मैं हूँ बावफ़ा तब तलक ये भरम बना रहने दे...
 *
रुखसत हुए मुद्दते गुज़री... खुश्बू अब तक फ़िज़ाओं में है तेरी
कयामत तलक रहेगा इंतज़ार मुझको... जाने किस पल हो वापसी तेरी
*
वतन पर कर गये जो जान निसार अपनी...
क्या सोचते होंगे कर आए बेकार जवानी अपनी...
इन नामुरादों की खातिर ही क्या मरना था हमको..
क्यूँ बिलखता छोड़ चल दिए थे माँ को अपनी..
*
जब कभी वफ़ा का दम नही भरा तुमने...
तो कैसे बेवफा कहूँ तुमको...
*
हर लम्हा होती रही गफलतें उनसे हर कदम...
जब सुलझने का वक़्त आया तो ज़िंदगी की डोर चुक गयी...
 *
लम्हा लम्हा हम होने लगे थे करीब जिनके
अब हर पल उन्ही से दूर जाने की कोशिश होगी....
 *
 नीले कागज पे पेन्सिल से लिखा तेरा खत आज भी मुझे तेरी याद दिलाता है...
कागज पे लिखा तो धुंधला गया.. पर दिल पे लिखी इबारत मिटती ही नही...

 *
कह  तो  दिया  की  तुझसे  नहीं  अब  वास्ता  कोई,
पर  जानता  हूँ  के  बिन  तेरे  नहीं  मेरा  वजूद  कोई.
*

तर्क-ए-मरासिम, तर्क-ए-मुहब्बत, रुसवाइयां भी उनकी देख लिया,
अब देखे रुखसते ज़िंदगी का और बहाना क्या होगा..
*
कर भी लेते तेरी बातों पे एतबार मगर
अपने ही तजुरबों ने भरोसा करना भुला दिया.
*
लाख कोशिशो के बाद भी खुद को ना बदल पाया हूँ मैं..
जाने तुमको क्या हुआ जो तुम तुम नही रहे..
*
लोग क्या सोचेंगे मेरे बारे में इसका मुझे मलाल नही
रंज बस इतना रहा की तू भी औरो जैसा निकाला
*
तुमको समझा था इस ज़माने से जुदा मैने
रंज बस इतना रहा की तू भी औरो जैसा निकाला
*
उनकी मोहब्बत का असर इस कदर तारी है मुझ पर
तर्क-ए-मरासिम के बाद भी ना निकले है बद्दुआ कोई.
*
निभा नही पाया शायद मैं ही उनसे कभी, वो जो पल मे मिज़ाज़ बदलते है
लिबास की बात छोड़ दो यारो, वो रोज़ाना चेहरे बदलते है..
*

हम भी थे डूबे हुए जिंदगी के कारोबार में,
क्यूँ ये इश्क़ हुआ की हम भी निक्कमे हो गये.
*
ना लगे दाग बेवफ़ाई का खुद पे कभी..
शायद इसीलिए उसने कभी इज़हार-ए-मुहब्बत नही किया.
*
जब किया तब टूट कर प्यार भी उसी ने किया,
अब तर्क-ए-मरसिम के बाद ज़ीना मुहाल भी उसी ने किया.
*
ज़िंदगी का हर रंग सिखाया उसी ने..
ओर बेरंग भी उसी ने किया.
*
मेरे नाम के अधूरेपन को भरा उसके साथ ने..
ओर ज़िंदगी को अधूरा भी बनाया उसी ने.
*
खुशिया, अरमान, सपने यहा तक अपनी ज़िंदगी से भी कर लिया समझोता उसने..
ए खुदा ! एक माँ होने की और कितनी सज़ा मिलेगी उसे..
*
लग के उसके गले, खोजता था मैं जीने के बहाने अपने.
करके इनकार यूँ संगदिल ने, जीने की वजह ही छीन ली.
*
बदलते रिश्तो की तरह बदल गया है जो...
क्या तेरे बदलने भर से बदल जाएगा वो....???
*
गर बदल भी लिया तूने खुद को उस की खातिर...
ज़रा सोच क्या यही है वो... जिसे चाहा था तूने...
*
करम तेरा रहम तेरा, ये ज़िंदगी है क्या बस भरम तेरा
ना हो संग तेरा तो फिर बचा ना कुछ धरम मेरा....
*
कभी ना की परवाह तूने, ज़माने के रस्म-ओ-रिवाज़ो की
फिर क्यूँ खुद को बदलने पर आमादा है आजकल... ??
*
तेरे होने से ही तो है मेरा भी वजूद...
जब तुम ही नही तो काहे का मैं...
*
बचे हैं जो मरासिम दरमियाँ अपने..
ढह ना जाए तेरी खामोश नज़रों से...
*
क्यूं साथ मिला किसी और को, इन्तजार मुझको नसीब
वफायें मिली किसी और को, रूसवाईयां मुझको नसीब
*
लोग अपना बनाते ही क्यूँ है, जब बेगाना कर देना होता है.
ज़िंदगी उनसे मिलावती ही क्यूँ है, जब बिछड़ जाना होता है.
*
मेरी ये ज़िंदगानी अधूरी सी है तुम्हारे बिना,
इसे पूरा कर दो... बस ये एहसान कर दो..
*
यूँ तमाम कोशिशो के बाद हम दो से एक हुए थे..
अब मुद्दते गुज़रेगी फिर से दो हो जाने मे...
*
तेरे साथ खुदा के दर पे जाने से डरता है दिल
एक खुदा के सामने दूसरे से माँगा जाए कैसे
*
तुझसे बिछड़ के बस यही सोचता हूँ...
तेरे साथ ये ज़िंदगी बिगाड़ दूं..
या तेरी यादों में ज़िंदगी गुज़ार दूं




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कमल किशोर जैन
(हालाँकि मैं नेरूदा नही.. और मैने उन्हे ज़्यादा पढ़ा भी नही.. पर ये कविता मेरे किसी अपने को बहुत पसंद है.. ओर उसी ने सबसे पहले मेरा परिचय नेरूदा से करवाया.. पता नही क्यूँ आज जब इस कविता को पढ़ने बैठा तो लगा की इसका एक एक शब्द मेरे मनोभाव को व्यक्त कर रहा है... अत: ये अनुवाद उस खास इंसान को समर्पित)

शायद आज रात मैं लिख पाऊंगा अपनी सबसे उदास कविता

इतनी कि जैसे ये रात है सितारों भरी
और नीले तारे सिहरते हैं दूर कहीं बहुत दूर
रात की हवाएं इस अनंत आकाश मे गाते हुए यूँ ही बेसबब डोलती हैं

आज रात लिख पाऊंगा अपनी सबसे उदास कविता
क्योंकि मैंने उसे चाहा, ओर थोड़ा उसने मुझे
इस रात की तरह थामे रहा उसे बाहों में
इस अनंत आकाश तले चूमा था उसे
क्योंकि उसने मुझे चाहा, थोड़ा  मैंने उसे
उसकी बड़ी ठहरी आँखों से भला कौन न करेगा प्यार
आज रात  लिख पाऊंगा सबसे उदास कविता अपनी
ये सोच कर कि अब वह मेरी नहीं. इस अहसास से कि मैंने उसे खो दिया

रातों को सुनकर, और-और उसके बिना पसरती रात
चारागाह पर गिरती ओस के मानिंद उसके छंद गिरते है आत्मा में
क्या फर्क पड़ता है यदि मेरा प्रेम उसे संजो न सका
रात तारों भरी है और वह मेरे संग नहीं
बस ये सब है. दूर कोई गाता है बहुत दूर

उसे खोकर मेरी आत्मा व्याकुल है
निगाहें मेरी खोजती हैं उसे, जैसे खींच उसे लायेंगी करीब

दिल मेरा तलाशता है, पर वह मेरे साथ नहीं.

वही रात, वही पेड़, उजला करती थी जिन्हें
पर हम, समय से .. कहाँ रहे वैसे

ये तय है अब और नहीं करूँगा उससे प्यार, पर मैंने उससे कितना किया प्यार
मेरी आवाज़ आतुर ढूंढ़ती है हवाएं जो छू सकें उसकी आवाज़
होगी, होगी  किसी और की जैसे वह मेरे चूमने के पहले थी


उसकी आवाज़,  दूधिया देह और आँखें निस्सीम
ये तय है अब और नहीं करूँगा उससे प्यार, या शायद करता रहूँ प्यार


कितना संक्षिप्त है ये हमारा प्यार.. और भूलने का अरसा कितना लंबा
ऐसी ही रात में मैं थामे था उसे अपनी बाहों में


मेरा मान शांत नही है उसे खोकर
शायद यह अंतिम पीड़ा है जो उसने दी है मुझे

और ये अंतिम कविता जो मैं लिखूंगा
उसके लिए .सिर्फ़ उसी के लिए